न्यायालय का अनन्या: एक कटु सत्य



न्याय की वेदी पर जब, सच को कुचला जाता है,
कानून के मंदिर में, अंधापन पाया जाता है।
जहां सत्य की पुकारें, मौन कर दी जाती हैं,
अन्याय की जयकारें, गूंज उठती हैं।

कभी जो न्यायालय था, धर्म का प्रतीक महान,
आज बन गया वो केवल, शक्ति और धन का स्थान।
जहां फैसले बिकते हैं, नोटों की झंकार पर,
सत्य हारता झुकता है, झूठ के प्रचार पर।

न्याय के तराजू में, जब झुकी होती है डंडी,
पीड़ित का हृदय फटता, पर न्याय बने है ठंडी।
कानून की किताबें, बस दिखावा बन जाती हैं,
और गवाहों की जुबानें, बोली लगाती हैं।

न्यायालय को चाहिए, सत्य का दीप जलाए,
हर पीड़ित के आंसू को, अपने आंचल में छुपाए।
अनन्या की राह को छोड़, न्याय की ओर बढ़े,
तभी ये देश हमारे, स्वर्णिम भविष्य की ओर बढ़े।

लेकिन सत्य यहां हारता, असत्य का राज्य जब होता है,
न्याय का यह मंदिर तब, अपवित्र और मूक हो जाता है।
जहां न्याय नहीं, बस अनन्या हो, वहां रोता है संविधान,
कानून की जड़ें हिलतीं, टूटता है लोकतंत्र का मान।

पर शायद एक दिन आएगा, जब सत्य उठेगा दुबारा,
जनता का विश्वास जीतकर, न्याय करेगा राज हमारा।
फिर से गूंजेगी जयकार, सत्य और धर्म की आवाज,
न्यायालय फिर बनेगा, सच्चाई का मजबूत ताज।


श्लोक
"सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः।
येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानम्।"
(सत्य ही जीतता है, असत्य नहीं। सत्य से ही जीवन का मार्ग प्रशस्त होता है।)





आधी-अधूरी आरज़ू

मैं दिखती हूँ, तू देखता है, तेरी प्यास ही मेरे श्रृंगार की राह बनती है। मैं संवरती हूँ, तू तड़पता है, तेरी तृष्णा ही मेरी पहचान गढ़ती है। मै...