प्रेम का अदृश्य संगम


प्रेमी कहीं दूर नहीं मिलते,
नहीं होता उनका कोई तय मुकाम।
वो तो सदा से एक-दूजे में हैं,
जैसे नदी में समाया हो गहराई का जाम।

मन के कोने में बसे वो अहसास,
जो बिना शब्दों के कह देते हैं बात।
नयनों की भाषा, हृदय की धड़कन,
उनका मिलन तो आत्मा का संगम।

चमकते तारे गवाह बन जाते हैं,
जब मौन में बातें होती हैं।
हवा की सरसराहट में उनका स्पर्श,
जैसे चाँदनी रातों में धीमी बूँदों का मर्म।

वो मिलते नहीं, क्योंकि अलग कभी थे ही नहीं,
जैसे छाया का अस्तित्व साये से अलग नहीं।
प्रेम कोई यात्रा नहीं, कोई मंज़िल नहीं,
ये तो आत्मा का अनंत शाश्वत प्रवाह है।

सांसों में गूंजती उनकी ध्वनि,
मन के भीतर उनकी छवि बनी।
न प्रेम सीमाओं में बंध सकता है,
न इसे किसी नाम से परिभाषित किया जा सकता है।

जैसे बीज में छिपा हो पूरा वृक्ष,
जैसे गगन में बसी हो धरती की प्यास।
प्रेमी तो सदा ही एक-दूसरे में हैं,
अदृश्य लेकिन अनंत आत्मिक निवास।


आधी-अधूरी आरज़ू

मैं दिखती हूँ, तू देखता है, तेरी प्यास ही मेरे श्रृंगार की राह बनती है। मैं संवरती हूँ, तू तड़पता है, तेरी तृष्णा ही मेरी पहचान गढ़ती है। मै...