मैं ठहरना चाहता था,
समय को मुट्ठी में बाँध लेना चाहता था।
पर वह रेत की तरह फिसल गया,
हर लम्हा, हर सांस बदल गया।
मैंने पहाड़ों से पूछा,
"क्या तुमने कभी खुद को अडिग पाया?"
उन्होंने हँसकर कहा,
"हवाओं ने हमें भी आकार दिया।"
मैंने लहरों से पूछा,
"क्या तुम सागर में एक ही रूप में रही?"
उन्होंने मुस्कुराकर कहा,
"प्रवाह ही हमारा जीवन है।"
अब मैं भी बहना चाहता हूँ,
हर क्षण को गले लगाना चाहता हूँ।
परिवर्तन की लय में थिरकना चाहता हूँ,
और उसमें ही अपनी मुक्ति पाना चाहता हूँ।
जब कुछ भी स्थायी नहीं,
तो विरोध कैसा?
हर बदलाव में एक नई राह,
हर अंत में एक नई शुरुआत।
अब मैं परिवर्तन से डरता नहीं,
अब मैं परिवर्तन में जीता हूँ।
क्योंकि अब मैं जानता हूँ—
स्वीकार में ही आनंद है,
स्वीकार में ही जीवन है।