नींद नहीं है आँखों में,
रात खड़ी है द्वार,
मैं चुपचाप पुकार रहा हूँ,
हे राम, एक बार।
मैं थक गया हूँ सोच-सोच,
मन भारी, साँस उदास,
शब्द नहीं हैं कहने को,
बस होना है तेरे पास।
मैं राम कहूँ, फिर रुक जाऊँ,
नाम में ही विश्राम,
जैसे बहती गंगा थाम ले
पथरीला हर संग्राम।
मैं नींद नहीं अब माँगता,
न सपनों का भार,
बस इतना कर दो, हे राम,
मन हो जाए पार।
अगर जागना ही लिखा है,
तो बोझ न बनना जाग,
और अगर सोना बख्श सको,
तो अपनी गोद में टाँग।
रात लम्बी है, डर नहीं,
मैं खुद से नहीं भाग,
मेरे भीतर दीप जला दो,
शेष तुम्हारा राग।