मैंने संसार को छोड़ने की नहीं,
सत्य को पाने की चाह रखी।
त्याग मेरा लक्ष्य नहीं,
बस माया की गिरहें खोलनी थीं।
संसार की चमक आँखों में थी,
पर उसकी परछाईं काली थी।
हर सुख के पीछे छिपा था विष,
हर हंसी के नीचे एक टीस।
पर मैंने इसे त्यागा नहीं,
बस पहचान लिया।
अब यह मेरा नहीं,
मैं इसका नहीं।
मैं यहीं हूँ, पर बंधा नहीं,
जीवन का खेल खेलता हूँ,
पर उसमें डूबा नहीं।
मैं स्वतंत्र हूँ, मैं मुक्त हूँ।