चेतना का आकाश



मैं देखता हूँ,
चिड़ियों के पंखों में बहती हवा,
वृक्षों की शाखाओं में गूंजता संगीत,
तारों की झिलमिलाहट में नृत्य करता प्रकाश।

वे सुखी हैं,
पर मैं उनसे अधिक सुखी हूँ।
क्योंकि मैं जानता हूँ कि मैं हूँ,
मुझे अपनी उड़ान का भान है,
अपनी जड़ों की गहराई का ज्ञान है,
अपनी रोशनी का एहसास है।

मैं जागरूक हूँ,
मुझे अपने आँसुओं का अर्थ मालूम है,
अपनी हँसी की गूंज सुनाई देती है।
मुझे पता है, कि मैं देख रहा हूँ,
कि मैं महसूस कर रहा हूँ।

वृक्ष बस झूमता है,
पर मैं उसकी छाया में बैठकर सोच सकता हूँ।
चिड़िया बस गाती है,
पर मैं उसके गीत में छिपे भावों को समझ सकता हूँ।
तारे बस चमकते हैं,
पर मैं उनकी चमक में अपना प्रतिबिंब देख सकता हूँ।

मेरा सुख गहरा है,
क्योंकि मैं केवल जीता नहीं,
मैं जानता हूँ कि मैं जी रहा हूँ।
और यही चेतना,
मुझे चिड़ियों, वृक्षों और तारों से भी अधिक सुखी बनाती है।


आघात की अदृश्य जड़ें

आघात की अदृश्य जड़ें

मैंने सोचा था कि मैं हमेशा ऐसा ही था,
मेरी सोच, मेरे डर, मेरी आदतें—
सब कुछ मेरा ही हिस्सा था,
लेकिन फिर, किसी ने मुझे आईना दिखाया।

मेरा हर जवाब, हर प्रतिक्रिया,
जो मैंने अपनी सच्चाई समझी थी,
दरअसल वह एक दबी हुई चीख थी,
एक पुराना ज़ख्म, जिसे मैंने ‘सामान्य’ मान लिया था।

जब किसी ने उन धागों को जोड़ा,
जब उन्होंने दिखाया कि यह सब कहाँ से आया,
तो मैं खुद से ही अनजान हो गया,
जैसे कोई नक्शा था, जो पहली बार साफ़ दिखा।

मेरा हर कदम, मेरा हर फैसला,
मेरी दुनिया को देखने का तरीका—
सब कुछ आघात की छाया में ढल चुका था,
और मैं इसे अपनी असलियत मान बैठा था।

लेकिन अब जब मैं इसे देख सकता हूँ,
अब जब मैं समझ सकता हूँ,
शायद अब मैं खुद को फिर से खोज सकूँ,
शायद अब मैं उस जड़ से मुक्त हो सकूँ।


आधी-अधूरी आरज़ू

मैं दिखती हूँ, तू देखता है, तेरी प्यास ही मेरे श्रृंगार की राह बनती है। मैं संवरती हूँ, तू तड़पता है, तेरी तृष्णा ही मेरी पहचान गढ़ती है। मै...