"मैं नहीं हूँ"



जितना गहरे उतरता हूँ अध्यात्म के सागर में,
उतना ही समझ पाता हूँ—
"मैं नहीं हूँ।"
यह आत्म-नकार का गीत नहीं,
न ही अपनी पहचान या पूर्वजों से विलगाव।
यह तो एक सत्य का स्पर्श है,
जो बस है—
"मैं हूँ।"

मैं पवन हूँ,
जो वृक्षों से फुसफुसाता है।
मैं जल हूँ,
जो प्यास को तृप्त करता है।
मैं वीणा हूँ,
जिसके तारों से सृष्टि का संगीत झंकृत होता है।

"मैं" और "तू" का भेद मिट चुका है।
यहाँ सब एक है,
न कोई द्वैत, न कोई विभाजन।
बस एक “अहंभाव” का विसर्जन।
जो बचता है, वह केवल होने का भाव है।

यह "मैं नहीं" कोई शून्यता नहीं,
यह पूर्णता है,
जहां हर वस्तु, हर स्वर,
मेरे भीतर जीवित है।
जहां हर "मैं हूँ"
बस अस्तित्व का उत्सव है।


आधी-अधूरी आरज़ू

मैं दिखती हूँ, तू देखता है, तेरी प्यास ही मेरे श्रृंगार की राह बनती है। मैं संवरती हूँ, तू तड़पता है, तेरी तृष्णा ही मेरी पहचान गढ़ती है। मै...