महाशिवरात्रि: सृजन और संहार का नृत्य



मैं शिव हूँ, मैं सृजन हूँ, मैं संहार भी हूँ।
मैं अंधकार में ज्योति, प्रकाश में छाया भी हूँ।
मेरे भीतर देवता भी गूँजते हैं, असुर भी बसते हैं,
मैं संतुलन हूँ, मैं तूफान का विराम भी हूँ।

मैंने देखा है, विनायक का शीश कटते हुए,
मैंने सुना है, कालभैरव का विकट हुंकार।
मैं वह स्पंदन हूँ, जो चीर देता है अज्ञान,
मैं वही मौन हूँ, जो उग्र से भी प्रखर।

देव भी मुझमें समाहित हैं, दानव भी समर्पित,
मैं महाकाल, जो काल को भी निगल जाए।
मुझमें युद्ध भी है, मुझमें शांति का विस्तार,
मैं रुद्र, जो रुदन से भी तपस्या रचाए।

इस रात्रि, जब ज्योति और तमस एक होंगे,
जब महासमुद्र मंथन भीतर जगेगा।
मैं स्वयं को खोजूँगा, मेरे भीतर का अमृत,
जो हर युद्ध, हर विष, हर मोह से परे होगा।

महाशिवरात्रि की यह रात,
ना केवल व्रत, ना केवल अर्चना।
यह भीतर के शिव का जागरण है,
अस्तित्व का महासमर्पण है।


आधी-अधूरी आरज़ू

मैं दिखती हूँ, तू देखता है, तेरी प्यास ही मेरे श्रृंगार की राह बनती है। मैं संवरती हूँ, तू तड़पता है, तेरी तृष्णा ही मेरी पहचान गढ़ती है। मै...