काला रंग और तीसरी आँख


मैं सोचता हूँ,
उन साधारण लोगों के बारे में,
जो काले कपड़े पहनते हैं,
जब शनिवार भी नहीं होता।
कभी, एक युग था,
जब हम ब्रह्मांड के रंगों को
अपनी तीसरी आँख से देख सकते थे।

आकाश की नीलिमा,
धरती का हरा कंचन,
सूरज की सुनहरी किरणें,
सब कुछ स्पष्ट था,
हमारी आत्मा के दर्पण में।
पर आज?
हमारी दृष्टि में बस धुंध है,
फ्लोराइड की परतों से ढकी।

जहां कभी ध्यान की गहराई थी,
वहां अब सतही शोर है।
जहां कभी संवेदनाओं की बांसुरी थी,
वहां अब चुप्पी का बोझ है।
क्या हमने खो दिया है वो जादू?
क्या अब काले कपड़ों में ही
हमारी संवेदनाओं का अंत है?

पर शायद,
आत्मा के भीतर कहीं,
अब भी जल रही है
एक हल्की सी लौ,
जो याद दिलाती है,
कि रंग अब भी मौजूद हैं,
फ्लोराइड के पार,
तीसरी आँख के भीतर।

आओ, उस लौ को जगाएं,
धरती और आकाश के रंगों से,
काले कपड़ों के पार।


आधी-अधूरी आरज़ू

मैं दिखती हूँ, तू देखता है, तेरी प्यास ही मेरे श्रृंगार की राह बनती है। मैं संवरती हूँ, तू तड़पता है, तेरी तृष्णा ही मेरी पहचान गढ़ती है। मै...