है क्या वो

जब कुछ पुरानी खट्टी यादें
चासनी बनकर मुंह पर आ जाए
तो फिर क्या कहने
याद है वो गहरी खाइयां
जो हमने अपने लिए खींची थी.
देखो तो जरा वक़त के थपेड़ों ने भर दी
वो खाइयां
एहसास हुआ है जो आज
तब न ऐसा एहसास हुआ था
जब तुम्ही ने कहा था
की वक़त  जवाब देता है.
मांगू क्या मैं उससे जो मुझसे मांगने आया है
दूँ क्या मैं उसे जिसे मैं अपना सब कुछ दे चूका
है क्या वो आखिर जिसे न लिया जा सकता है
न किसी को दिया जा सकता है

अपनी शक्ति का बोध


मैंने जाना,
सुख-दुख की डोर
मेरे ही हाथों में है।
जैसे सागर में जल का प्रवाह,
वैसे ही मेरे चुनाव
निर्धारित करते हैं मेरी राह।

अपनी शक्ति का एहसास,
मुझमें भरता है प्रकाश।
जो बोझ थे दूसरों की अपेक्षाओं के,
उन्हें उतार फेंका मैंने।
अब मैं हूँ स्वतंत्र,
खुद की भूमि पर खड़ा।

जीवन का अर्थ,
मैं खुद गढ़ता हूँ।
हर अनुभव, हर क्षण,
मेरे द्वारा रचित है।
यह स्वीकृति, यह विश्वास,
मुझे देती है नया प्रकाश।

अब मैं अपना सूरज हूँ,
अपना चाँद, अपनी रातें।
अपना संगीत, अपना स्वर,
अपनी मंज़िल, अपनी बात।

जो भी करूँ,
वह मेरी आत्मा से उपजा हो।
और जो भी कहूँ,
वह सच्चाई की राह दिखाए।
इस सत्य के संग,
मैं जीता हूँ पूर्ण,
अपने आप में परिपूर्ण।


कला और विज्ञान का संगम


कला का विज्ञान पढ़ो,
विज्ञान की कला समझो।
दृष्टि का विस्तार करो,
हर कण में संबंध खोजो।

देखना सिर्फ़ आँखों से नहीं,
दिल और दिमाग से देखो।
हर रेखा, हर रंग, हर तथ्य में,
एक गहरी कड़ी महसूस करो।

कला सिखाती है अभिव्यक्ति,
विज्ञान देता है आधार।
दोनों मिलकर दिखाते हैं,
जीवन का अद्भुत विस्तार।

हर चीज़ जुड़ी है हर चीज़ से,
ये ब्रह्मांड एक ताने-बाने सा है।
हर धागा, हर रंग, हर नियम,
एक अदृश्य धारा में बहता है।

तो देखो, समझो, और जानो,
इस संसार के अद्भुत खेल को।
क्योंकि हर कला और हर विज्ञान,
एक ही सत्य का हिस्सा हैं।

आधी-अधूरी आरज़ू

मैं दिखती हूँ, तू देखता है, तेरी प्यास ही मेरे श्रृंगार की राह बनती है। मैं संवरती हूँ, तू तड़पता है, तेरी तृष्णा ही मेरी पहचान गढ़ती है। मै...