मैंने देखा है इस बनावटी दुनिया को,
जहाँ हर साँस गिरवी रखी जाती है,
जहाँ धूप काँच से छनकर आती है,
और चाँदनी भी सिर्फ़ विज्ञापन बनकर चमकती है।
मैं तीन महीने जंगल में रहा,
जहाँ हवा ने मुझे छुआ बिना किसी करार के,
जहाँ पानी बहा अपनी असली भाषा में,
जहाँ धरती ने मुझसे कुछ नहीं माँगा,
सिर्फ़ मेरा होना काफ़ी था।
मैं एक द्वीप पर रहा,
जहाँ लहरों ने मुझे आवाज़ दी,
जहाँ आकाश का रंग असली था,
जहाँ समय कोई कैद नहीं था,
सूरज डूबता, तो मैं डूबता उसके संग।
मैं एक मंदिर में बैठा,
जहाँ पत्थर भी साँस लेते थे,
जहाँ घंटियों की ध्वनि हवा में नहीं,
मेरे रक्त में गूँजती थी,
जहाँ शांति का कोई मूल्य नहीं था,
क्योंकि वह बस थी—बस थी।
अब मैं लौटा हूँ,
इस झूठी दुनिया में,
जहाँ हम अपने ही प्राणियों का रक्त चूसते हैं,
जहाँ जीवन ऊर्जा बेची जाती है,
और हम ख़ुद को ही भगवान मान बैठे हैं।
हमने नदियाँ खो दीं, जंगल निगल लिए,
मिट्टी को प्लास्टिक बना दिया,
हमने 90% खो दिया,
अब जो बचा है, वह भी कब तक रहेगा?
मुझे नहीं पता।
पर मैं जानता हूँ,
कि जो कुछ भी असली था,
वह अब सिर्फ़ मेरी स्मृतियों में साँस लेता है।