जनता की कुर्सी, नेता का सिंहासन



चुना जिन्हें था आस भरोसे,
वे खुद ही बन बैठे हैं दोषी।
जनता की आवाज़ जो दबाते,
सत्ता की महफ़िल में खोते होश ही।

वादा किया था सेवा का,
पर स्वार्थ बना है धर्म यहाँ।
सिंहासन पर बैठते ही क्यों,
बदलता है हर कर्म यहाँ?

जो कभी कहते थे— "हम तुम्हारे",
अब दरवाजे पर पहरे बैठे।
जिन हाथों से हाथ मिलाया,
वही आज घोटाले गिनते।

सत्ता के गलियारों में,
अहंकार का राज चला।
भूल गए हैं वे चेहरों को,
जो आशाओं संग खड़े मिला।

लोकतंत्र का अर्थ बचा क्या?
जब लोक ही ठगा सा खड़ा रहे।
नेता मसीहा नहीं रहे अब,
बस स्वर्ण सिंहासन पर पड़े रहे।

— दीपक दोभाल




आधी-अधूरी आरज़ू

मैं दिखती हूँ, तू देखता है, तेरी प्यास ही मेरे श्रृंगार की राह बनती है। मैं संवरती हूँ, तू तड़पता है, तेरी तृष्णा ही मेरी पहचान गढ़ती है। मै...