मैंने देवों को रोका था,
उनके काम में टांग अड़ाई थी,
सोचा था, मैं भी मालिक हूँ,
अपनी मर्जी चलवाई थी।
पर भूल गया था मैं एक बात,
जो कालचक्र से टकराएगा,
वह खुद ही चूर-चूर होगा,
संसार उसे न अपनाएगा।
मनुष्य का क़ानून कागज़ पर,
पर ब्रह्मांड का आदेश पत्थर,
जो इसे न समझे, मिट जाएगा,
फिर चाहे वह हो राजा या भिखारी बंज़र।
देवों की राह में काँटे बोकर,
मैंने सोचा था जीतूंगा,
पर विधि का विधान बड़ा कठोर,
अब देखो, मैं कहाँ जी रहा हूँ।
कोई नाम नहीं, कोई शान नहीं,
बस भटकता एक प्रेत हूँ मैं,
जो देवों से भिड़ बैठा था,
अब शापित यह चेत हूँ मैं।
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