Saturday, 2 November 2019

अँधेरे

इस अँधेरे के पीछे  कहीं  एक उजाला छुपा  है
उस उजाले मे छुपी  है एक किरण
उस किरण मे है एक रौशनी
वो रौशनी  जो जगमगाए  इस अँधियारे  मे
 जहाँ है मुर्दो  की बस्ती 
बस्ती  मे है जिन्दा लाशें 
जो लड़ रही है सिर्फ  जीने के लिए
पर उसे फिर भी जीना  नहीं आता
बाहर  से कोई कितना भी
अपने आप को जिन्दा दिखाए 
 मगर अंदर  से तो पूरा मरा है
मरा   है अज्ञानता  से
मरा  है जरूरत  से
सपनो को मारकर भी जो 
सोचते हैँ की वो सपने पूरे कर रहे हैँ
वो अँधेरे  मे जी रहे हैँ.

#दीपक डोभााल. 

Thursday, 31 October 2019

मीरा

जब मीरा यह कहती है कि बस इन तीन बातों से काम चल जाएगा और कुछ जरूरत नहीं है और कभी कुछ न मांगूंगी, बस इतना पर्याप्त है, बहुत है, जरूरत से ज्यादा है—और इसके बाद जो वचन है:

          मोरमुकुट पीताम्बर सोहे, गल बैजंती माला।

जैसे कि दर्शन हो गया! ये मोरमुकुट पहने हुए, ये पीतांबर पहने हुए, गले में वैजंतीमाला डाले हुए कृष्ण सामने खड़े हो गए! जिसके हृदय में चाकरी का भाव हुआ, उसके सामने कृष्ण खड़े हो ही जाएंगे। अब और कमी क्या रही!

         बिन्द्राबन में धेनु चरावें, मोहन मुरली वाला।

अब मीरा को दिखाई पड़ने लगा। मीरा की आंख खुली। अब मीरा अंधी नहीं हैं। यह जो...

       मोरमुकुट पीताम्बर सोहे, गल बैजंती माला।
       बिन्द्राबन में धेनु चरावें, मोहन मुरली वाला।

...यह दृश्य हो गया। रूप बदला। यह जगत मिटा, दूसरा जगत शुरू हुआ।

      ऊंचे—ऊंचे महल चिनाऊं, बिच—बिच राखूं बारी।

अब सोचती है मीरा: अब क्या करूं?

                     ऊंचे—ऊंचे महल चिनाऊं...

अब परमात्मा मिल गया। यह परमात्मा की झलक आने लगी। अब परमात्मा के लिए—

       ऊंचे—ऊंचे महल बिनाऊं, बिच—बिच राखूं बारी।

बीच—बीच में बारी भी रख लूंगी, क्योंकि मैं तो वहां रहूंगी।

      चाकर रहसूं बाग लगासूं, नित उठ दरसन पासूं।
       बिन्द्राबन की कुंज गलिन में, तेरी लीला गासूं।
     ऊंचे—ऊंचे महल चिनाऊं, बिच—बिच राखूं बारी।

बीच—बीच में झरोखे रख लूंगी कि तुम मुझे दिखाई पड़ते 

      रहो और कभी—कभी मैं तुम्हें दिखाई पड़ जाऊं।
         सांवरिया के दरसन पाऊं, पहर कुसुंबी सारी।
      जोगी आया जोग करण कूं, तप करने संन्यासी।
        हरि भजन कूं साधु आया, बिन्द्राबन के वासी।

मीरा कहती है: मैं तो सिर्फ हरि—भजन को आई हूं। जोगी जोगी की जाने। संन्यासी संन्यासी की जाने।

                 जोगी आया जोग करण कूं...

उसको योग करना है। उसको कुछ करके दिखाना है। मेरी करके दिखाने की कोई आकांक्षा नहीं है। मैं—और क्या करके दिखा सकूंगी? तुम मालिक, मैं तुम्हारी चाकर! तुम्हीं मेरे सांस हो, तुम्हीं मेरे प्राण हो। मैं क्या करके दिखा सकूंगी? करने को कहां कुछ है? करने को उपाय कहां है? करोगे तो तुम! होगा तो तुमसे! मेरे किए न कुछ कभी हुआ है, न हो सकता है।
जोगी जोगी की जाने, मीरा कहती है।

       जोगी आया जोग करण कूं, तप करने संन्यासी।

और तपस्वी है, वह तप करने आया है। उसको व्रत—उपवास इत्यादि करने हैं। उनकी वे समझें।

मीरा कहती है: उनसे मुझे कुछ लेना—देना नहीं है। मुझे भूल कर भी जोगी या तपस्वी मत समझ लेना। मेरा तो कुल इतना ही आग्रह है:

         हरिभजन कूं साधु आया, बिन्द्राबन के वासी।
     हे वृंदावन के रहने वाले! मैं तो भजन करने आई हूं।

साध—संगत में उसने भजन सीखा है। मैं तो तुम्हारे गुण गाना चाहती हूं। मैं तो तुम्हारी प्रशंसा के गीत गाना चाहती हूं। मैं तो तुम्हारे पास एक गीत बनना चाहती हूं। इस शरीर की सारंगी बना लूंगी और नाचूंगी।

फर्क क्या है? भक्त परमात्मा के पास सिर्फ नाचना चाहता है, उत्सव करना चाहता है, उसकी और कोई मांग नहीं। अहोभाव प्रकट करना चाहता है। क्योंकि जो चाहिए, वह तो मिला ही हुआ है। जो चाहिए, उसने दिया ही है; मांगने का कोई सवाल नहीं, सिर्फ धन्यवाद देना चाहता है


Tuesday, 3 September 2019

‘ॐ’ ओंकार क्या है? – ओशो



ओंकार का अर्थ है, जिस दिन व्यक्ति अपने को विश्व के साथ एक अनुभव करता है, उस दिन जो ध्वनि बरसती है। जिस दिन व्यक्ति का आकार से बंध हुआ आकाश निराकार आकाश में गिरता है, जिस दिन व्यक्ति की छोटी-सी सीमित लहर असीम सागर में खो जाती है, उस दिन जो संगीत बरसता है, उस दिन जो ध्वनि का अनुभव होता है, उस दिन जो मूल-मंत्र गूंजता है, उस मूल-मंत्र का नाम ओंकार है। ओंकार जगत की परम शांति में गूंजने वाले संगीत का नाम है।

गीता में कृषण कहते है – “मैं जानने योग्य पवित्र ओंकार हूं”

ओंकार का अनुभव इस जगत का आत्यंतिक, अंतिम अनुभव है। कहना चाहिए, दि आल्टिमेट फ्रयूचर। जो हो सकती है आखिरी बात, वह है ओंकार का अनुभव।

# ओंकार जगत की परम शांति में गूंजने वाले संगीत का नाम है।
# ओंकार का अर्थ है – “दि बेसिक रियलिटी” वह जो मूलभूत सत्य है, जो सदा रहता है।
# जब तक हम शोरगुल से भरे है, वह सूक्ष्मतम् ध्वनि नहीं सुन सकते।

संगीत दो तरह के हैं। एक संगीत जिसे पैदा करने के लिए हमें स्वर उठाने पड़ते हैं, शब्द जगाने पड़ते हैं, ध्वनि पैदा करनी पड़ती है। इसका अर्थ हुआ, क्योंकि ध्वनि पैदा करने का अर्थ होता है कि कहीं कोई चीज घर्षण करेगी, तो ध्वनि पैदा होगी। जैसे मैं अपनी ताली बजाऊं, तो आवाज पैदा होगी। यह दो हथेलियों के बीच जो घर्षण होगा, जो संघर्ष होगा, उससे आवाज पैदा होगी।

तो हमारा जो संगीत है, जिससे हम परिचित हैं, वह संगीत संघर्ष का संगीत है। चाहे होंठ से होंठ टकराते हों, चाहे कंठ के भीतर की मांस-पेशियां टकराती हों, चाहे मेरे मुंह से निकलती हुई वायु का ध्क्का आगे की वायु से टकराता हो, लेकिन टकराहट से पैदा होता है संगीत। हमारी सभी ध्वनियां टकराहट से पैदा होती हैं। हम जो भी बोलते हैं, वह एक व्याघात है, एक डिस्टरबेंस है।

ओंकार उस ध्वनि का नाम है, जब सब व्याघात खो जाते हैं, सब तालियां बंद हो जाती हैं, सब संघर्ष सो जाता है, सारा जगत विराट शांति में लीन हो जाता है, तब भी उस सन्नाटे में एक ध्वनि सुनाई पड़ती है। वह सन्नाटे की ध्वनि है; “Voice of Silence” वह शून्य का स्वर है। उस क्षण सन्नाटे में जो ध्वनि गूंजती है, उस ध्वनि का, उस संगीत का नाम ओंकार है। अब तक हमने जो ध्वनियां जानी हैं, वे पैदा की हुई हैं। अकेली एक ध्वनि है, जो पैदा की हुई नहीं है; जो जगत का स्वभाव है; उस ध्वनि का नाम ओंकार है। इस ओंकार को कृष्ण कहते हैं, यह अंतिम भी मैं हूं। जिस दिन सब खो जाएगा, जिस दिन कोई स्वर नहीं उठेगा, जिस दिन कोई अशांति की तरंग नहीं रहेगी, जिस दिन जरा-सा भी कंपन नहीं होगा, सब शून्य होगा, उस दिन जिसे तू सुनेगा, वह ध्वनि भी मैं ही हूं। सब के खो जाने पर भी जो शेष रह जाता है। जब कुछ भी नहीं बचता, तब भी मैं बच जाता हूं। मेरे खोने का कोई उपाय नहीं है, वे यह कह रहे हैं। वे कह रहे हैं, मेरे खोने का कोई उपाय नहीं है। मैं मिट नहीं सकता हूं, क्योंकि मैं कभी बना नहीं हूं। मुझे कभी बनाया नहीं गया है। जो बनता है, वह मिट जाता है। जो जोड़ा जाता है, वह टूट जाताहै। जिसे हम संगठित करते हैं, वह बिखर जाता है। लेकिन जो सदा से है, वह सदा रहता है।

इस ओंकार का अर्थ है, दि बेसिक रियलिटी; वह जो मूलभूत सत्य है, जो सदा रहता है। उसके ऊपर रूप बनते हैं और मिटते हैं, संघात निर्मित होते हैं और बिखर जाते हैं, संगठन खड़े होते हैं और टूट जाते हैं, लेकिन वह बना रहता है। वह बना ही रहता है। यह जो सदा बना रहता है, इसकी जो ध्वनि है, इसका जो संगीत है, उसका नाम ओंकार है। यह मनुष्य के अनुभव की आत्यंतिक बात है। यह परम अनुभव है।

इसलिए आप यह मत सोचना की आप बैठकर ओम-ओम का उच्चार करते रहें, तो आपको ओंकार का पता चल रहा है। जिस ओम का आप उच्चार कर रहे हैं, वह उच्चार ही है। वह तो आपके द्वारा पैदा की गई ध्वनि है।

इसलिए धीरे-धीरे होंठ को बंद करना पड़ेगा। होंठ का उपयोग नहीं करना पड़ेगा। फिर बिना होंठ के भीतर ही ओम का उच्चार करना। लेकिन वह भी असली ओंकार नहीं है। क्योंकि अभी भी भीतर मांस-पेशियां और हड्डियां काम में लाई जा रही हैं। उन्हें भी छोड़ देना पड़ेगा। भीतर मन में भी उच्चार नहीं करना होगा। तब एक उच्चार सुनाई पड़ना शुरू होगा, जो आपका किया हुआ नहीं है। जिसके आप साक्षी होते हैं, कर्ता नहीं होते हैं। जिसको आप बनाते नहीं, जो होता है, आप सिर्फ जानते हैं।

जिस दिन आप अपने भीतर ओंम की उस ध्वनि को सुन लेते हैं, जो आपने पैदा नहीं की, किसी और ने पैदा नहीं की; हो रही है, आप सिर्फ जान रहे हैं, वह प्रतिपल हो रही है, वह हर घड़ी हो रही है। लेकिन हम अपने मन में इतने शोरगुल से भरे हैं कि वह सूक्ष्मतम ध्वनि सुनी नहीं जा सकती। वह प्रतिपल मौजूद है। वह जगत का आधर है।

– ओशो
गीता दर्शन, अध्याय-9, प्रवचन-7

Thursday, 11 July 2019

यादों का गुब्बरा

यादों का गुब्बरा देखो
ये फूट गया है
उस गगन में जिस  में हम खुद जाना चाहते थे
मगर हम जा न पाए तो क्या हुआ
हमारी निशानी  उस मुक्त गगन में उड़ रही थी
पर जमीं की हमारी धूल  ने
उस हाइड्रोजन के गुब्बारे को आज फोड़ दिया  है
और  हमारी  यादों के फटते हुए गुब्बारे
मुक्त गगन उड़ रहे हैं टूट फूट  कर वो
 कण कण हो गए
और हर कण  में हम भी बस  गए



Saturday, 30 March 2019

है ये जिंदगी

जाने क्यों इतनी सी अतरंगी हो गयी है जिंदगी
अभी तो हम ने कोई रंग दिखाना न शुरू किया
मगर फिर भी नजाने क्यों
अपनी सी नहीं लगती है 
है ये जिंदगी |

आरजूओं के चक्रव्यूह  मे फसे है अरमान
नदी  के  भवँर जैसे जालसाजी है इमान
लाख आप निकलना चाहो पर
हवाओं की तरह उड़ती आती
है ये जिंदगी 

सवालों के धागों में उलझी जिंदगी
 जवाबों के फेरे लगाती जिंदगी
 जलेबी की तरह टेढ़े मेढ़े
सवालों और जवाबों  के बीच झूलती
 है ये जिंदगी


 मायने नहीं है जहाँ कर्म की पोटलीयां
 मायने हैं यहाँ सिर्फ हाँ बोलती कठपुतलियां
 कर्म और धर्म की बीच उंगली उठाती
है ये जिंदगी


Thursday, 31 January 2019

है क्या वो

जब कुछ पुरानी खट्टी यादें
चासनी बनकर मुंह पर आ जाए
तो फिर क्या कहने
याद है वो गहरी खाइयां
जो हमने अपने लिए खींची थी.
देखो तो जरा वक़त के थपेड़ों ने भर दी
वो खाइयां
एहसास हुआ है जो आज
तब न ऐसा एहसास हुआ था
जब तुम्ही ने कहा था
की वक़त  जवाब देता है.
मांगू क्या मैं उससे जो मुझसे मांगने आया है
दूँ क्या मैं उसे जिसे मैं अपना सब कुछ दे चूका
है क्या वो आखिर जिसे न लिया जा सकता है
न किसी को दिया जा सकता है

Thursday, 27 December 2018

धूप की तरह


तुझे पा लिया धूप की तरह
मगर धूप की तरह ही तू
सुबह कुछ देर ताजगी का एहसास देती है
और फिर दिन की गर्मी की तरह जलाती है

मैं जलता रहता हूँ तेरी खिलखिलाती धुप में
छांव भी नसीब नहीं
मगर तेरी जुल्फ जब मैं  ओढ़ लेता हूँ
 चेहरे पर वो मुझे शाम का एहसास देती है

जब तक ये एहसास जीता हूँ
तब तक तू शाम की तरह कहीं अँधेरे में खो जाती है
मैं ढूंढता फिरता रहता हूँ तुझे अँधेरे में
मगर ना जाने कहाँ तू खो जाती है

हर दिन धुप की तरह तू आती है
और रात की तरह चली जाती है
और मैं हर  पल तेरे लिए
जलता भी हूँ  बुझता भी हूँ 

अँधेरे

इस अँधेरे के पीछे  कहीं  एक उजाला छुपा  है उस उजाले मे छुपी  है एक किरण उस किरण मे है एक रौशनी वो रौशनी  जो जगमगाए  इस अँधियारे  मे  जह...