मैं देख रहा हूँ,
बदलती हुई लहरों को,
जहाँ जहर छोड़कर,
लोग अमृत की ओर बढ़ रहे हैं।
मैं सुन रहा हूँ,
उन उत्सवों की धुन,
जो चारदीवारी से मुक्त होकर,
खुले आसमान के नीचे गूँज रहे हैं।
मैं महसूस कर रहा हूँ,
वह प्यास, जो अब
मुख्यधारा के शोर से नहीं,
प्राचीन ऋचाओं की गहराइयों से बुझ रही है।
मैं देख रहा हूँ,
आँखों में जलते हुए प्रश्न,
जो अब उत्तर खोज रहे हैं
किसी पुरानी पोथी के पन्नों में,
या किसी संत की मौन दृष्टि में।
मैं जानता हूँ,
यह जागरण अब नहीं रुकेगा।
यह आत्मा की पुकार है,
जो युगों की नींद तोड़ चुकी है।
मैं देख रहा हूँ,
नवयुग की नई किरणें,
जो इस दुनिया को
फिर से सत्य के आलोक में नहा देंगी।