मैं मुक्त हूँ



मैंने संसार को छोड़ने की नहीं,
सत्य को पाने की चाह रखी।
त्याग मेरा लक्ष्य नहीं,
बस माया की गिरहें खोलनी थीं।

संसार की चमक आँखों में थी,
पर उसकी परछाईं काली थी।
हर सुख के पीछे छिपा था विष,
हर हंसी के नीचे एक टीस।

पर मैंने इसे त्यागा नहीं,
बस पहचान लिया।
अब यह मेरा नहीं,
मैं इसका नहीं।

मैं यहीं हूँ, पर बंधा नहीं,
जीवन का खेल खेलता हूँ,
पर उसमें डूबा नहीं।
मैं स्वतंत्र हूँ, मैं मुक्त हूँ।


महंगी डिग्री, सस्ती समझ



किताबों से ज्यादा फीस भारी,
ज्ञान से ज्यादा कर्ज़ की सवारी!
डिग्री मिली, नौकरी नहीं,
पर कर्ज़ चुकाने की आई बारी!

कभी गर्मी में काम कर लेते,
ट्यूशन, किताबें खुद भर लेते।
अब तो ब्याज ही इतना बड़ा,
बंदा पढ़े या किडनी बेच दे!

क्लासरूम में ज्ञान नहीं,
बस PPT की बारिश है!
प्रोफेसर भी गूगल पढ़ाते,
पर फीस की गिनती शानदार है!

उधारी में डिग्री, उधारी में सपना,
उधारी में बस ज़िंदगी अपनी!
टॉप यूनिवर्सिटी के गुलाम बनकर,
चलते फिरते गिरवी हम सब ही!

शिक्षा की कीमत इतनी बढ़ा दी,
कि विद्या अब धंधा बनी।
सीखना था बुद्धिमानी कभी,
अब बस EMI बनी!

— दीपक दोभाल




डिग्री का मसाला, EMI का तड़का



कभी गर्मी में मेहनत करते,
आधी छुट्टी में फीस भरते!
अब तो यूनिवर्सिटी के दरवाज़े पर,
लोन के बही खाते पढ़ते!

क्लास में घुसो, दिमाग को धो लो,
PPT घसीट के पास हो लो!
प्रोफेसर खुद गूगल से सीखें,
हम कहें— "सर, बस ज्ञान दो!"

पर ज्ञान तो अब बिकाऊ ठहरा,
EMI में टुकड़ों में बंटा!
डिग्री मिली, नौकरी नहीं,
पर ब्याज हर महीने कटा!

कभी विद्या थी साधना जैसी,
अब MBA का पैकेज देखो!
ज्ञान नहीं, ब्रांडिंग बिकती,
Resume में Name Tag देखो!

लोन में घर, लोन में गाड़ी,
अब लोन में डिग्री का फंडा!
कब कमाएँ, कब चुकाएँ,
बना दिया हमको गुलामों का झुंडा!

तो भाइयों बहनों, ज्ञान बटोरो,
पर लोन का जंजाल न ओढ़ो!
नालंदा में लोन नहीं था,
फिर भी ज्ञानी वहाँ जोड़ा!

— दीपक दोभाल


डिग्री का कर्ज़ – पढ़ाई या पड़ाई?



कभी गर्मी में काम कर लेते,
आधा समर, फीस भर लेते!
अब दस साल की EMI लेकर,
डिग्री का मंदिर पूज रहे थे!

क्लास में घुसते ही लगता—
कोई कोचिंग सेंटर में आए हैं!
गुरुजी गूगल से पढ़ा रहे,
हम नोट्स नहीं, लोन चुकाए हैं!

MBA की फीस में बंगला आ जाता,
PhD के खर्चे में कार खड़ी होती!
लेकिन डिग्री के बाद भी भैया,
ताक रहे हैं नैया ! 




आधुनिकता की अटपटी अटरिया



ऊँची-ऊँची अटरिया बन रही,
नींव मगर हिल रही, हाय रे!
कंगूरे चमकते सोने जैसे,
पर नीचे कीचड़ मिल रही, हाय रे!

मॉर्डर्निटी के नाम पर भाई,
पैर कटाकर जूते पहन रहे!
संस्कारों को फेंक के ऐसे,
रॉकेट से चप्पल चला रहे!

"पश्चिम में देखा, वैसा करो!"
भाई, थोड़ा तो दिमाग लगाओ!
नींव पुरानी, मजबूत रखो,
फिर ऊँची मीनारें बनाओ!

गाँव का खटिया, चाय पियो,
फिर लैपटॉप पर काम करो!
संस्कृति की जड़ें पकड़ो पहले,
फिर चाँद पर जाके आराम करो!

कंगूरे तभी टिक पाएँगे,
जब ज़मीन की मिट्टी साथ रहे।
मॉर्डर्निटी का लड्डू खाओ,
पर परंपरा की थाली पास रहे!

— दीपक दोभाल




चार वर्णों की प्राचीन कथा: एक सजीव सभ्यता और उसकी विस्मृति


भारतीय सभ्यता में चार वर्ण – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र – का एक विशेष स्थान है। यह वर्ण व्यवस्था आज के समाज में प्रायः विवाद का विषय बन गई है, लेकिन यदि हम इसके ऐतिहासिक मूल्यों और वास्तविक उद्देश्य को समझें, तो इसके भीतर एक गहन वैज्ञानिक और सामाजिक संतुलन छुपा है। यह व्यवस्था समाज के सभी अंगों को जोड़कर एक समान और संतुलित रूप से चलाने का प्रयास करती थी।

चार वर्णों की प्राचीन यात्रा

एक कथा के अनुसार, एक ब्राह्मण, एक क्षत्रिय, एक वैश्य और एक शूद्र एक साथ जंगल में गए। वे सभी मित्र थे, और उनमें गहरी समझ और प्रेम था। जब वे जंगल पहुंचे, तो अंधेरा होने लगा और वे रास्ता भटक गए। संकट की इस घड़ी में, सभी ने अपने-अपने स्वभाव के अनुसार अपने कार्य किए।

ब्राह्मण ने अपने ज्ञान के अनुसार दिशाओं का अनुमान लगाया और जंगल की ऊर्जा को समझा। उसने यज्ञ और अनुष्ठान करने का सुझाव दिया ताकि सब सुरक्षित रहें।

क्षत्रिय ने लकड़ियों को इकठ्ठा किया और पत्थरों की मदद से हथियार तैयार किए, क्योंकि उसका कौशल रक्षा और युद्ध में था।

वैश्य ने उनकी संसाधनों की गणना की और सोचा कि लंबे समय तक कैसे जीवित रहा जा सकता है, कैसे संसाधनों का अधिकतम उपयोग किया जा सकता है।

शूद्र ने सबकी मदद करते हुए एक सुंदर ढाँचा तैयार किया ताकि सब आराम से रह सकें। उसने पानी की व्यवस्था की और सभी की ज़रूरतों का ध्यान रखा।


इस तरह सबने मिलकर एक दूसरे की सहायता की और इस प्रकार एक सुव्यवस्थित जीवन का आधार रखा।

वर्णों का महत्व और उनकी भूमिका

चारों वर्णों की अपनी-अपनी भूमिकाएँ थीं, जो पीढ़ियों से उनके गुण और परंपराओं के अनुसार विकसित हुई थीं। ब्राह्मणों का धर्म था ज्ञान का अध्ययन करना और धर्म को प्रसारित करना। जैसे कि भगवद्गीता में कहा गया है:

> "शमो दमस्तप: शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च |
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ||"
(भगवद्गीता 18.42)



अर्थात्, ब्राह्मण का धर्म शांति, संयम, तपस्या, शुद्धता, सहनशीलता, सरलता, ज्ञान और विज्ञान है। क्षत्रिय का कार्य युद्ध करना और समाज की रक्षा करना था, जबकि वैश्य का कार्य व्यापार और कृषि से समाज की अर्थव्यवस्था को समृद्ध करना था। शूद्र का कार्य था अन्य वर्णों की सेवा करना और निर्माण कार्यों में सहयोग देना। यह सामाजिक संरचना समाज में संतुलन और समृद्धि लाने के लिए थी।

एक सजीव सभ्यता का निर्माण

इन चार वर्णों के संगठित प्रयासों से एक महान सभ्यता का निर्माण हुआ। ब्राह्मण अपनी विद्या से समाज को मार्गदर्शन देते थे, क्षत्रिय रक्षा करते थे, वैश्य व्यापार और संसाधनों का प्रबंधन करते थे, और शूद्र सेवा और कारीगरी का कार्य करते थे। इस प्रकार समाज में सभी वर्णों का विशेष योगदान था, और सबका कार्य एक-दूसरे से जुड़ा हुआ था। एक सुंदर श्लोक में कहा गया है:

> "विद्या विनय संपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिन:॥"
(भगवद्गीता 5.18)



अर्थात, एक ज्ञानी व्यक्ति सभी को समान दृष्टि से देखता है, चाहे वह ब्राह्मण हो, गऊ हो, हाथी हो या श्वान।

समाज का पतन और वर्ण व्यवस्था की विस्मृति

समय के साथ, वर्णों का वास्तविक उद्देश्य और उनके गुण धीरे-धीरे खोने लगे। ब्राह्मण अपने ज्ञान को भूल गए और समाज में अशांति का कारण बन गए। क्षत्रिय, जो समाज की रक्षा करते थे, सत्ता के लिए संघर्ष में उलझ गए। वैश्य धन-संचय में अधिक रुचि लेने लगे, और शूद्रों को समाज में अपमानित किया जाने लगा। इस प्रकार वर्ण व्यवस्था का संतुलन बिगड़ गया।

पुनः जागरण की आवश्यकता

आज के समय में, हमें प्राचीन ज्ञान को समझने और पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। समाज में हर व्यक्ति का स्थान और कर्तव्य है, और हमें एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए। महर्षि मनु कहते हैं:

> "सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दु:खभाग्भवेत्॥"
(मनुस्मृति 8.23)



अर्थात, सभी सुखी हों, सभी स्वस्थ रहें, सभी मंगल देखें और किसी को भी दुःख का सामना न करना पड़े।

यह प्राचीन कथा यह सिखाती है कि समाज में विविधता में एकता ही सबसे बड़ी शक्ति है। हमारे पूर्वजों ने वर्ण व्यवस्था को समाज के उत्थान के लिए एक मार्ग के रूप में स्थापित किया था, न कि एक विभाजन के लिए। यह केवल एक सामाजिक संरचना नहीं थी, बल्कि एक वैज्ञानिक और सांस्कृतिक प्रणाली थी, जो प्रकृति और मानवीय संवेदनाओं के अनुरूप थी।

आइए, हम अपने प्राचीन मूल्यों को समझें और एक सुंदर, संतुलित समाज की पुनः स्थापना में योगदान दें, जहां सभी वर्ण, सभी वर्ग और सभी धर्म मिलकर एक मानवता का निर्माण कर सकें।


एक रिश्ता

एक अजीब सा रिश्ता है
संग उसके
 रिश्ता वो जो न उसने बनाया
 न मैंने बनाया
बस बातों ही बातों में बन गया
कुछ उसकी नादानियाँ
कुछ मेरी मासूमियत
दोनों ने मिलकर ऐसा
समा बांघा कि सबकी जुबां पर
हमारा नाम आ गया
पर लड़ते झगड़ते हैं हम
उसी में कुछ खुशी है
और वही तो एक रिश्ता है 

आधी-अधूरी आरज़ू

मैं दिखती हूँ, तू देखता है, तेरी प्यास ही मेरे श्रृंगार की राह बनती है। मैं संवरती हूँ, तू तड़पता है, तेरी तृष्णा ही मेरी पहचान गढ़ती है। मै...