हम त्रैतीयिक अस्तित्व हैं,
आत्मा में लिपटी एक आत्मा,
और फिर शरीर में लिपटी हुई हम,
यह शरीर पहला रूप है, जिसे हम देखते हैं,
और अक्सर आकर्षण का आधार बन जाता है।
लेकिन यह केवल पहला मंज़िल है,
सच्चा आधार तो कहीं और छिपा है।
भावनात्मक आत्मा,
जो हमें समझ और समर्थन देती है,
वह ही तय करती है कि आकर्षण कहाँ तक खड़ा रहेगा,
वह कभी स्थिर करती है, कभी अस्थिर।
और फिर, जो भीतर की आत्मा है,
जो सच्चे प्रेम और मानवीय मूल्यों से भरपूर है,
वह है हमारा असली आधार,
जहाँ आत्मीयता और सच्चाई का संगम होता है।
यह आत्मा वह है,
जो भगवान और सभी के प्रति सम्मान, प्रेम और सत्यता से जुड़ी है।
जब इस आत्मिक नींव का अभाव होता है,
तब शरीर और भावना की दीवारें गिर जाती हैं,
क्योंकि यह आत्मा ही है,
जो रिश्ते की स्थिरता का आधार बनती है।
इसलिए हमें शारीरिक और भावनात्मक आकर्षण को रोककर,
आध्यात्मिक कनेक्शन पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए,
ताकि हमारी रिश्तों की नींव मजबूत हो,
और वह सच्ची, स्थायी और स्थिर हो,
जो समय और जीवन की कठिनाइयों में कभी नहीं गिरें।