मैंने देखा एक सपना,
जो सीमाओं में नहीं बंधा,
न समाज के पैमानों में,
न दुनियावी तराजू में तौला गया।
मुझे नहीं चाहिए वो सफलता,
जो चुपचाप जीने का सौदा करे,
जो आत्मा की उड़ान को,
बस एक नौकरी से जोड़ा करे।
मैंने चुन लिया है पागलपन,
अपनी ही धुन में जीने का,
जहाँ हर सोच एक आग हो,
हर कदम मेरा संगीत हो।
नियमों की जंजीरें तोड़कर,
अपनी दुनिया खुद रचूँगा,
जो चाहूँगा, वही बनूँगा,
नहीं किसी और से जियूँगा।
सच तो यह है कि ज़िंदगी,
एक खेल है उन दीवानों का,
जो खुद को मुक्त कर लेते हैं,
हर झूठे बहानों से, हर पहरेदारों से।
मैं खुद अपनी पहचान हूँ,
कोई नाम, कोई ओहदा नहीं,
मैं बस वही हूँ, जो होना चाहता हूँ,
अपनी उड़ान, अपनी रोशनी।