नींद



नींद नहीं है आँखों में,
रात खड़ी है द्वार,
मैं चुपचाप पुकार रहा हूँ,
हे राम, एक बार।

मैं थक गया हूँ सोच-सोच,
मन भारी, साँस उदास,
शब्द नहीं हैं कहने को,
बस होना है तेरे पास।

मैं राम कहूँ, फिर रुक जाऊँ,
नाम में ही विश्राम,
जैसे बहती गंगा थाम ले
पथरीला हर संग्राम।

मैं नींद नहीं अब माँगता,
न सपनों का भार,
बस इतना कर दो, हे राम,
मन हो जाए पार।

अगर जागना ही लिखा है,
तो बोझ न बनना जाग,
और अगर सोना बख्श सको,
तो अपनी गोद में टाँग।

रात लम्बी है, डर नहीं,
मैं खुद से नहीं भाग,
मेरे भीतर दीप जला दो,
शेष तुम्हारा राग।


मैं हर दिन नया साल जीता हूँ


मैं हर दिन नया साल जीता हूँ
मैं नए साल का इंतज़ार नहीं करता,
कैलेंडर से अपनी दिशा तय नहीं करता।
मेरे लिए जनवरी एक तारीख है,
और हर सुबह—एक नया अवसर।
मैं संकल्प नहीं लिखता,
क्योंकि मैं खुद को रोज़ पढ़ता हूँ।
जहाँ कल गिरा था,
वहीं आज संभलना सीखता हूँ।
मैं अपनी गलतियों से भागता नहीं,
उन्हें गुरु बना लेता हूँ।
हर चूक, हर हार—
मुझे थोड़ा और सच्चा बना जाती है।
मैं बेहतर बनने की कसम
साल में एक बार नहीं खाता,
मैं हर साँस के साथ
खुद से ईमानदार रहने की प्रैक्टिस करता हूँ।
मैं जानता हूँ—
विकास कोई आयोजन नहीं,
वह एक शांत, निरंतर यात्रा है
जो हर दिन मुझसे समय माँगती है।
मैं कल से आगे निकलने की होड़ में नहीं,
मैं बस इतना चाहता हूँ—
आज का मैं,
कल के मुझसे थोड़ा अधिक जागरूक हो।
मैं नए साल का जश्न नहीं मनाता,
मैं रोज़ खुद को गढ़ता हूँ।
क्योंकि मेरे लिए
विकास एक दिन का फैसला नहीं,
हर दिन की प्रतिबद्धता है।