नकाब का सच



जिन चेहरों पर मुस्कान झूठी सजी,
उन आँखों में केवल चालाकी बसी।
एक नकाब, जो भोलेपन का खेल दिखाए,
पर भीतर की कड़वाहट सच छिपाए।

वो बातें मीठी, जैसे शहद का जाल,
पर हर शब्द में छिपा है एक नया सवाल।
तुम्हारे विश्वास को हथियार बना,
वो अपनी चालों से तुम्हें हर बार ठगा।

पर जब सच की रोशनी ने परदा हटाया,
उनकी असलियत का आईना दिखाया।
तो वो नकाब, जो दुनिया को भरमाता था,
तुम्हारे आगे बिखरकर गिर जाता था।

अब उनके चेहरे पर कोई शर्म नहीं,
न कोई बहाना, न कोई करम सही।
तुमने देख लिया जो वो छिपाना चाहें,
अब उनका छल तुम्हें खुले में सताए।

दुनिया के सामने वो अब भी मासूम,
पर तुम्हारे लिए उनका दिल है धूमिल कस्तूरी का झूठा परफ्यूम।
उनकी चालें अब खुले मैदान में,
तुम्हारी आँखों में सच्चाई का साम्राज्य।

पर यह जान लो, तुम्हारी जीत है यह,
तुमने उनके जाल से खुद को बचाया है।
उनकी कड़वाहट अब तुम्हारा डर नहीं,
तुम्हारा सच ही तुम्हारी ढाल बन गया है वहीं।

अब उनकी हर चाल दिखती है साफ,
तुमने जीत लिया है अपने जीवन का एक अध्याय।
नकाब के पीछे छिपे उस चेहरे को जानकर,
तुमने खुद को बचाया है उनके जाल से हटकर।


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