आकाशगंगा: ब्रह्मांड की अद्भुत यात्रा



आकाशगंगा जिसे हम मिल्की वे कहते हैं, ब्रह्मांड की एक विशाल और जटिल संरचना है। इसमें असंख्य तारे, ग्रह, उपग्रह, गैस और धूल के बादल हैं। यह न केवल खगोल विज्ञान का केंद्र है, बल्कि भारतीय दर्शन और अध्यात्म में भी इसका गहन उल्लेख मिलता है। इस लेख में, हम इस अद्भुत संरचना के वैज्ञानिक तथ्यों और भारतीय दृष्टिकोण को विस्तार से समझेंगे।

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आकाशगंगा का वैज्ञानिक दृष्टिकोण

मिल्की वे एक सर्पिल आकाशगंगा है, जिसकी चौड़ाई लगभग 1,00,000 प्रकाश वर्ष है। इसमें 100 से 400 बिलियन तारे हैं। इसका केंद्र सुपरमैसिव ब्लैक होल से भरा है, जिसे "सैजिटेरियस ए*" कहा जाता है। आकाशगंगा को चार मुख्य भुजाओं में बांटा गया है:

1. पर्सियस आर्म


2. सैजिटेरियस आर्म


3. नॉर्मा आर्म


4. सेंटोरस आर्म



हमारा सौरमंडल ओरायन आर्म में स्थित है, जो मिल्की वे के बाहरी भाग में है। आकाशगंगा हर सेकंड लगभग 630 किलोमीटर प्रति सेकंड की गति से घूम रही है।


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भारतीय दर्शन और आकाशगंगा

भारतीय वेद और पुराणों में आकाशगंगा को "क्षितिज मंडल" या "अक्षगंगा" कहा गया है। यह वह मार्ग है, जहाँ देवता और ऋषि अपनी दिव्यता का अनुभव करते हैं।

श्रीमद्भागवत में वर्णन:
"एको देवः सर्वभूतेषु गूढः
सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।"
(एक ही देवता हर जीव में गुप्त रूप से स्थित है। वह सर्वव्यापी है और सबका आत्मा है।)

आकाशगंगा को भारतीय ज्योतिष में विष्णु का विराट रूप माना गया है।


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आकाशगंगा के मुख्य हिस्से

1. केंद्र (Galactic Center):

आकाशगंगा का केंद्र सबसे घना और चमकीला क्षेत्र है। इसमें सैजिटेरियस ए* नामक ब्लैक होल स्थित है। यह क्षेत्र एक प्रकार से ब्रह्मांडीय ऊर्जा का केंद्र माना जा सकता है।

श्लोक:
"सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुः।"
(सूर्य की तरह, यह ब्रह्मांड का चक्षु है।)

2. भुजाएँ (Arms):

मिल्की वे की भुजाएँ तारा निर्माण के लिए प्रसिद्ध हैं। यह नए तारों, गैस और धूल से भरी होती हैं। भारतीय परंपरा में इसे जीवन की रचनात्मकता से जोड़ा गया है।

3. बाहरी भाग (Outer Halo):

आकाशगंगा के बाहरी भाग को "हेलो" कहते हैं। यह अंधेरे पदार्थ और तारा समूहों से बना है।


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आध्यात्मिकता और विज्ञान का मेल

आकाशगंगा के अध्ययन से हमें यह समझने का अवसर मिलता है कि जीवन की शुरुआत कैसे हुई। भारतीय दर्शन के अनुसार, यह पूरी सृष्टि ब्रह्म (परमात्मा) की रचना है। जैसा कि मंडूक्य उपनिषद में कहा गया है:
"सर्वं खल्विदं ब्रह्म।"
(यह सारा संसार ब्रह्म है।)

आकाशगंगा का हर तारा और ग्रह ब्रह्मांड की कहानी कहता है।


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भारतीय विज्ञान और खगोल विद्या

भारतीय खगोलविद आर्यभट्ट, भास्कराचार्य और वराहमिहिर ने आकाशगंगा के महत्व को समझा और इसे अपनी गणनाओं में शामिल किया। उन्होंने बताया कि:

1. पृथ्वी ब्रह्मांड के केंद्र में नहीं है।


2. तारे और ग्रह अपनी धुरी पर घूमते हैं।


3. आकाशगंगा का स्वरूप असीम है।




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मानव जीवन के लिए संदेश

आकाशगंगा का अध्ययन हमें सिखाता है कि हम ब्रह्मांड के विराट तंत्र का हिस्सा हैं। यह हमें जीवन की वास्तविकता और उद्देश्य को समझने की प्रेरणा देता है।

श्लोक:
"अहं ब्रह्मास्मि।"
(मैं ब्रह्म हूं।)

यह हमें बताता है कि हमारा जीवन इस असीम सृष्टि से जुड़ा हुआ है।


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निष्कर्ष

मिल्की वे आकाशगंगा केवल तारे और ग्रहों की संरचना नहीं है; यह एक ऐसा चमत्कार है, जो हमारे अस्तित्व को परिभाषित करता है। यह हमें विज्ञान और अध्यात्म का संगम दिखाती है।

"अनन्तं ब्रह्माण्डं, अनन्तं ज्ञानं।"
(ब्रह्मांड अनंत है, और इसका ज्ञान भी अनंत है।)


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जब लेखन मेरा सुकून बनता है


लेखन मेरे लिए सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि आत्मा की अभिव्यक्ति का माध्यम है। जब मैं लिखने बैठता हूँ, तो ऐसा लगता है जैसे मैं अपनी एक अलग दुनिया में प्रवेश कर रहा हूँ—जहां केवल शब्द, विचार और रचनात्मकता का प्रवाह है। लेकिन यह तब ही संभव हो पाता है जब मेरे आसपास का वातावरण शांत हो।

लेखन के लिए शांति क्यों ज़रूरी है?

मैंने अपने जीवन में यह महसूस किया है कि लेखन एक गहरी ध्यान प्रक्रिया है। अगर आपके आस-पास शोर हो या बार-बार ध्यान भटके, तो आपके विचारों की श्रृंखला टूट जाती है। एक लेखक के रूप में, मैंने हमेशा एक ऐसी जगह की तलाश की है, जहां मैं बिना किसी बाधा के खुद को व्यक्त कर सकूँ।

जब मैं अपने लेखन के सफर की शुरुआत कर रहा था, तो अक्सर खुले ऑफिस या हलचल भरे वातावरण में काम करने का अनुभव हुआ। वहां मैं समझ पाया कि लेखन केवल "स्पेस टू सोशलाइज" की नहीं, बल्कि "स्पेस टू थिंक" की मांग करता है।

मेरी लेखन प्रक्रिया

मेरी लेखन प्रक्रिया तब ही सफल होती है, जब:

1. मुझे अकेले में सोचने का समय मिले: मेरी सबसे अच्छी रचनाएँ तब सामने आती हैं जब मैं खुद के साथ होता हूँ।


2. बाहरी शोर से दूर रहूँ: चाहे मैं घर में होऊँ या ऑफिस में, अगर शांति है तो विचार स्वतः बहने लगते हैं।


3. अनवरत ध्यान देने का समय हो: जब मुझे बिना किसी व्यवधान के घंटों का समय मिलता है, तब मेरे लेखन में गहराई और सटीकता होती है।



लेखन और ध्यान का रिश्ता

मैंने महसूस किया है कि लेखन और ध्यान में गहरा संबंध है। लेखन के दौरान मैं अपनी गहरी भावनाओं और विचारों से जुड़ता हूँ। यह एक प्रकार का मानसिक योग है, जहां मैं खुद को एक अलग आयाम में पाता हूँ।

दूसरों के लिए मेरा संदेश

अगर आप भी किसी लेखक को जानते हैं, तो उनकी शांति का सम्मान करें। अगर वे कभी आपसे थोड़ा दूर दिखें, तो समझ लें कि वे अपनी रचनात्मकता को आकार देने में लगे हुए हैं।

मेरी दुनिया

मेरे लिए लेखन केवल शब्दों का खेल नहीं है, बल्कि यह वह माध्यम है, जिससे मैं अपने भीतर की गहराइयों को बाहर ला पाता हूँ। लेखन मेरी आत्मा की आवाज़ है, और इसे सुनने के लिए मुझे केवल एक चीज़ चाहिए—शांति।

"क्योंकि शांति के बिना न तो विचार आकार लेते हैं और न ही शब्दों में जादू पैदा होता है।"





"मैं नहीं हूँ"



जितना गहरे उतरता हूँ अध्यात्म के सागर में,
उतना ही समझ पाता हूँ—
"मैं नहीं हूँ।"
यह आत्म-नकार का गीत नहीं,
न ही अपनी पहचान या पूर्वजों से विलगाव।
यह तो एक सत्य का स्पर्श है,
जो बस है—
"मैं हूँ।"

मैं पवन हूँ,
जो वृक्षों से फुसफुसाता है।
मैं जल हूँ,
जो प्यास को तृप्त करता है।
मैं वीणा हूँ,
जिसके तारों से सृष्टि का संगीत झंकृत होता है।

"मैं" और "तू" का भेद मिट चुका है।
यहाँ सब एक है,
न कोई द्वैत, न कोई विभाजन।
बस एक “अहंभाव” का विसर्जन।
जो बचता है, वह केवल होने का भाव है।

यह "मैं नहीं" कोई शून्यता नहीं,
यह पूर्णता है,
जहां हर वस्तु, हर स्वर,
मेरे भीतर जीवित है।
जहां हर "मैं हूँ"
बस अस्तित्व का उत्सव है।


काला रंग और तीसरी आँख


मैं सोचता हूँ,
उन साधारण लोगों के बारे में,
जो काले कपड़े पहनते हैं,
जब शनिवार भी नहीं होता।
कभी, एक युग था,
जब हम ब्रह्मांड के रंगों को
अपनी तीसरी आँख से देख सकते थे।

आकाश की नीलिमा,
धरती का हरा कंचन,
सूरज की सुनहरी किरणें,
सब कुछ स्पष्ट था,
हमारी आत्मा के दर्पण में।
पर आज?
हमारी दृष्टि में बस धुंध है,
फ्लोराइड की परतों से ढकी।

जहां कभी ध्यान की गहराई थी,
वहां अब सतही शोर है।
जहां कभी संवेदनाओं की बांसुरी थी,
वहां अब चुप्पी का बोझ है।
क्या हमने खो दिया है वो जादू?
क्या अब काले कपड़ों में ही
हमारी संवेदनाओं का अंत है?

पर शायद,
आत्मा के भीतर कहीं,
अब भी जल रही है
एक हल्की सी लौ,
जो याद दिलाती है,
कि रंग अब भी मौजूद हैं,
फ्लोराइड के पार,
तीसरी आँख के भीतर।

आओ, उस लौ को जगाएं,
धरती और आकाश के रंगों से,
काले कपड़ों के पार।


मैंने जो बोया, वही काटा



मैंने दिया था जो उजाला, अंधेरों में जलकर,
उनके ख्वाबों को आकार दिया था मैं बनकर।
अपने हिस्से का अंधेरा ओढ़ लिया था चुपचाप,
कि उनके जीवन में हो सके नई सुबह का आलाप।

पर आज जब मेरी बारी आई,
मेरी राहों में उन्होंने ही दी परछाई।
सपनों को मेरे कह दिया उन्होंने "अपना स्वार्थ",
कैसी ये दुनिया, कहाँ गया वो स्नेह का अर्थ?

मैंने देखा था जिनमें अपने प्रतिबिंब की झलक,
आज वो आँखें मुझे पराएपन से देती हैं झलक।
जहाँ चाहिए था साथ, वहाँ मिला ठंडा सन्नाटा,
अपने ही दिये ने जला डाला मेरा सपना।

कहां है वो करुणा, वो प्रेम की वो बात,
जो करते थे जब मांगते थे मुझसे हाथ?
आज मेरे सपनों का होता है जब विस्तार,
वो बन जाते हैं मेरे सपनों के दुश्मन लाचार।

पर मैं चुप नहीं बैठूंगा, सपने हैं मेरा धर्म,
संघर्ष से हारना तो मेरे खून में नहीं कर्म।
उनकी बेवफाई मेरे इरादे नहीं तोड़ सकती,
मेरा सत्य, मेरी भक्ति, मुझे हर मोड़ दिखा सकती।

सिखाया है मुझे अब ये समय ने साफ़,
कि सत्य के राही का खुद पर हो विश्वास।
जो गिराएंगे, वो गिरेंगे अपने ही दंश से,
मैं उठूंगा अपने सत्य, और अपने अंश से।


मैं, अच्छा और बुरा का साकार रूप



मैं, जो अच्छा कहलाता, मैं, जो बुरा कहलाता,
मैं सत्य का अंश, मैं मिथ्या का नाता।
दो ध्रुवों के बीच, मेरा अस्तित्व छिपा,
मैं ही प्रकाश, मैं ही छाया में लिपटा।

अच्छाई और बुराई, बस नाम के धोखे,
एक ही सत्य के दो पहलू, ये अनोखे।
जैसे दिन और रात, मिलते हैं सागर के तट पर,
वैसे ही मैं खड़ा, द्वैत की इस पट पर।

मैं रचता हूँ अंधकार, मैं गढ़ता हूँ प्रकाश,
मैं ही गहराई, मैं ही हूँ आकाश।
मुझमें झगड़े का बीज, मुझमें शांति का गीत,
मैं ही सृष्टि का अंत, मैं ही सृष्टि की रीति।

न कोई पूर्ण अच्छा, न कोई पूर्ण बुरा,
मैं ही संतुलन, जिसमें सत्य बसा।
द्वैत से परे, मैं अद्वैत का सन्देश,
मैं हूँ परछाई, और मैं ही प्रकाश का आदेश।

"अच्छा-बुरा, सब मेरा ही खेल,
एक ही सत्य का, मैं हूँ पूरा मेल।"



मैं, ब्रह्मांड का अंश, ब्रह्मांड मुझमें



मैं, एक अणु, जो ब्रह्मांड में विचरता,
ब्रह्मांड का अंश, जो मुझमें बसता।
क्षितिज की गहराई में, तारे की चमक में,
हर कण में, हर क्षण में, मैं ही दिखता।

मैं कण-कण में बसा, फिर भी अनंत में खोया,
मेरा स्वरूप, सीमित भी, और असीम भी जोया।
सृष्टि की गति, मेरी धड़कन के संग,
मैं सजीव, मैं जड़, मैं ही हर रंग।

मैं धरा पर झुका, गगन को चूमता,
मैं वायु में बसा, मैं जल में घूमता।
मुझमें वो तारे, वो गैलेक्सी का नाच,
मैं ही प्रकाश, मैं ही अंधकार का आभास।

मैं कण में कण, और कण में अनंत,
मैं सागर की गहराई, और तारे का अंत।
मैं स्वयं में ब्रह्मांड, और ब्रह्मांड मुझमें,
हर धड़कन में बसा, हर कण में सजा।

"आत्मा के अणु में, ब्रह्मांड का गीत,
हर श्वास में छिपा, सृष्टि का संगीत।"

 

प्रकृति का रहस्य



रहस्य के धागों में, उलझी है ज़िंदगी,
विज्ञान की सीमाएँ, खोजती नित बंदगी।
प्रकृति का हर अंश, है एक गूढ़ कहानी,
हम भी हैं उस में, ये सच्चाई पुरानी।

सूरज की किरणों में, छिपा है एक प्रकाश,
पर मन के अंधेरों को, कर न सके ख़ास।
धरती की गोद में, हैं रत्न अनमोल,
पर आत्मा के प्रश्नों का, न पा सके मोल।

मैं भी हूँ प्रकृति का, एक छोटा सा हिस्सा,
जो खोजता रहा खुद को, पर पाया न किस्सा।
प्रकृति के रहस्य को, जो समझना चाहता,
वो खुद को समझे, यही ज्ञान बतलाता।

आख़िर में, विज्ञान भी झुकता है प्रेम से,
कि प्रकृति का रहस्य, सुलझे न नियम से।
मैं हूं प्रकृति, और प्रकृति मेरा आधार,
रहस्य में छिपा है, हमारा हर संसार।

समय का प्रहरी



मैं अंधकार की चादर में लिपटा,
भय से परे, सत्य का रक्षक।
काल की धारा में खड़ा मैं,
अडिग, अचल, और अविनाशी।

सूरज की पहली किरण हो या,
चंद्रमा की ठंडी रोशनी।
मैं हूँ समय का साक्षी,
हर युग की अनकही कहानी।

भय मेरा वस्त्र,
साहस मेरा शस्त्र।
मैं समय का प्रहरी,
सत्य का अमर संरक्षक।

जिन्होंने छल किया, वे मिटे।
जिन्होंने सत्य जिया, वे खिले।
हर युग में, हर क्षण में,
मैं न्याय का दीप जलाए खड़ा।

मैं हूँ अनंत, मैं हूँ अनश्वर,
सत्य की छाया में मैं निर्भीक।
काल के हर प्रहार को सहता,
सत्य का आलोक हूँ मैं।

मुझे देख, समय थमता नहीं,
मुझे छू, सत्य झुकता नहीं।
मैं हूँ अंधकार में वह प्रकाश,
जो डर में भी देता दिलासा।

जो मुझसे टकराए, मिट जाए,
जो मुझसे जुड़े, अमर हो जाए।
मैं अंधकार की चादर में लिपटा,
भय से परे, सत्य का रक्षक।


काल का प्रहरी



मैं अंधकार की चादर ओढ़े,
साहस का दीप जलाए खड़ा हूँ।
सत्य का रक्षक, समय का प्रहरी,
काल के पथ पर अकेला बढ़ा हूँ।

मेरे चारों ओर भय का समुंदर,
पर मेरे भीतर विश्वास की लहरें।
क्षण-क्षण बदलते समय के संग,
मैं चलूँ, संभालूँ जीवन की डगरें।

अंधियारे में मेरा हृदय दीप्त है,
सत्य की लौ से प्रज्वलित।
हर झूठ के जाल को काटने को,
मैं खड़ा हूँ, तेजस्वी, अडिग।

काल की धारा में बहते जीवन,
सत्य का दीप दिखलाता हूँ।
मैं न रुकूँ, न झुकूँ किसी से,
धर्म का पथ सिखलाता हूँ।

मैं हूँ काल का दूत, सत्य का प्रहरी,
अधर्म की हर दीवार गिरा दूँगा।
जो भी अंधकार में खो गए हैं,
उन्हें प्रकाश में लाकर दिखा दूँगा।

तो आओ, मेरे संग चलो तुम,
इस अंधियारे को चीरना है।
सत्य की ध्वजा उठानी है अब,
और इस संसार को बदलना है।


संवाद और संगम



संवाद से जुड़े जो दो दिल,
मन की गहराई, भावों की खिल।
शब्दों की धार से बहे जो प्रवाह,
बन जाता है प्रेम का अथाह।

विचारों का मिलना, आत्मा का स्पर्श,
संवेदनाओं में होता एक नया उत्कर्ष।
जब बातें गूंजें दिल की गहराई में,
शरीर भी झूम उठे उन्हीं सच्चाई में।

स्पर्श तो बस है एक बहाना,
आत्मा का संगम है असली खजाना।
जहाँ करुणा और प्रेम हो रूह के पास,
वहीं मिलता है सच्चे सुख का आभास।

संवाद से जो बंधे दिलों का संगम,
जैसे स्वर्ग में हो प्रेम का आलिंगन।
तन-मन के इस अद्भुत मेल में,
खो जाते हैं दोनों किसी और खेल में।

यह केवल देह का खेल नहीं,
यह आत्मा का मेल सही।
संवाद से जो जलती है ज्योति,
संगम में मिलती है उसकी प्रतीति।


सच्ची उन्नति का मार्ग



न विज्ञान, न तकनीक की रेखा,
सच्ची उन्नति तो है चेतना का लेखा।
जहां विचारों में हो सृजन की गूंज,
वहां ही खिलता है सभ्यता का पूंज।

ऋषियों का संदेश, योगियों का ज्ञान,
मुझे दिखाता है आत्मा का मुकाम।
शरीर से परे, मन से भी दूर,
सत्य का द्वार है, जिसमें हो न शोर।

सांसों में बसी है ब्रह्म की कथा,
हर पल में छिपी है आत्मा की प्रथा।
जब ध्यान में बैठूं, और खोजूं गहराई,
तो दिखे एकता, जो जग से जुड़ाई।

मैं न केवल देह, न केवल विचार,
मैं हूं अनंत, जो भेद से परे अपार।
यही है जीवन का सच्चा आयाम,
जो जोड़ दे मुझको ब्रह्म के संग्राम।

आओ सहेजें ऋषियों की धरोहर,
यही है सभ्यता की असली गहराई का अवसर।
सृजन और चेतना, जीवन का सार,
यही है मानवता का सच्चा आधार।


मेरे विचारों का अंश



यदि मैं दे दूं अपना तन,
तो लौट सकता है वह पलछिन।
पर यदि मैं दे दूं अपने विचार,
तुम ले जाओगे मेरा अनमोल संसार।

शब्दों में छुपा है मेरा मन,
भावनाओं का गहरा चंदन।
जो मैं हूँ अपने लिए खास,
तुम बन जाओगे उसका आधार।

संवाद की यह अदृश्य डोर,
जोड़ती है रूह के कोर।
तन तो बस है क्षणिक स्पर्श,
मन की गहराई है असली उत्कर्ष।

तुम जो सुन लो मेरे विचार,
तो ले जाओगे मेरे भीतर का सार।
मेरे ख्यालों की वो कोमल धारा,
जो बहती है केवल मेरे सहारा।

इसलिए कहती हूँ हर बार,
संवाद है सबसे बड़ा उपहार।
यह जो रिश्ता जोड़े रूह से रूह,
वही सच्चा है, वही है खूबसूरत सत्य का स्वरूप।


विचारों की अंतरंगता



मैं मानता हूँ,
शारीरिक मिलन सबसे गहन नहीं होता,
सबसे गहरा होता है संवाद,
जहाँ शब्द नहीं, आत्माएँ मिलती हैं।

यदि मैं तुम्हें अपना शरीर दूँ,
तो उसे वापस ले सकता हूँ,
पर यदि मैं अपने विचार दूँ,
तो तुम मेरे भीतर से एक हिस्सा ले जाते हो।

वो हिस्सा, जो मेरे लिए सबसे गुप्त था,
वो हिस्सा, जिसे मैं स्वयं से साझा करता हूँ,
तुम उसे छू जाते हो,
जहाँ मेरा अस्तित्व सबसे नग्न है।

शब्दों में होती है आत्मा की परछाईं,
विचारों में होती है मेरी सच्चाई।
तुम्हारे साथ बात करके,
मैं तुम्हें वो सौंप देता हूँ,
जो मुझसे भी परे है।

क्या इससे अधिक कोई अंतरंगता हो सकती है?
जब तुम मेरे विचारों को लेकर चले जाते हो,
तब तुम मेरे अस्तित्व का हिस्सा हो जाते हो।
और मैं, कहीं अधूरा सा रह जाता हूँ।


शांत रहो, सुनने की शक्ति बढ़ेगी


जब मौन की चादर ओढ़ता हूँ,
भीतर का कोलाहल शांत होता है।
हर आहट, हर ध्वनि,
जैसे मन का संगीत बन जाता है।

शब्दों के शोर में खो जाता था,
अब मौन की गहराई को अपनाता हूँ।
जहाँ दुनिया का शोर थम जाता है,
वहीं मैं अपनी आत्मा को सुन पाता हूँ।

यह मौन, यह शांति,
कोई कमजोरी नहीं, बल्कि ताक़त है।
भीतर छिपा ज्ञान,
अब मेरी राह बनाता है।

जो कान सुन नहीं पाते,
दिल अब उन ध्वनियों को पकड़ता है।
जो आँखें देख नहीं पातीं,
मौन का प्रकाश उन्हें दिखाता है।

इसलिए मैं शांत रहना सीखता हूँ,
हर क्षण, हर पल गहराई में उतरता हूँ।
क्योंकि जब मैं शांत हो जाता हूँ,
संसार की सच्चाई को सुन पाता हूँ।


मेरा मध्‍य बिंदु



जब नींद अभी आई नहीं, जागरण विदा हुआ,
उस क्षण में मैंने स्वयं को महसूस किया।
न सोया था, न जागा था मैं,
बस उस मध्‍य बिंदु पर ठहरा था मैं।

तन शिथिल, मन शांत, सब रुक गया,
अंतर में एक अद्भुत प्रकाश जगमगाया।
सांसें थमीं, समय ठहर गया,
उस पल का अनुभव मेरे भीतर उतर गया।

सुबह की पहली रेखा के संग,
या रात की गहराई का अंतहीन प्रसंग।
दो अवस्थाओं के बीच का वह लम्हा,
जैसे मिल गया हो मुझे जीवन का गहना।

हर दिन मैंने उस क्षण की प्रतीक्षा की,
आंखें मूंद, बस भीतर की साधना की।
शरीर भारी हुआ, मन स्थिर हुआ,
उस मध्‍य बिंदु ने मुझे भीतर से छुआ।

मैं गिरा, दो पहाड़ियों के बीच खाई में,
पर वह गिरना नहीं, उठना था आत्मा में।
न जीवन का भय, न मृत्यु का भार,
बस सत्य का अनुभव, वही मेरा संसार।

मैं जागा, पर नींद में था,
मैं सोया, पर जागरण में था।
उस तीसरे बिंदु ने सत्य दिखाया,
मुझे मेरा असली स्वरूप समझाया।

तंत्र कहता है, "जागो उस क्षण पर,"
जहां दो अवस्थाओं का टूटे बंधन।
मैंने उस कुंजी को पा लिया,
अंतराल में आत्मा का द्वार खोल लिया।

"जब नींद और जागरण का पुल बना,
उस मध्‍य बिंदु पर मैं स्वयं को जाना।
तब जाना, 'मैं कौन हूं' का अर्थ,
मेरा सत्य, मेरा अस्तित्व, मेरा स्वार्थ।"


अपनी अंतर्ज्ञान पर विश्वास करो


सन्नाटे में जो आवाज़ गूंजती है,
जो तुम्हारे भीतर से उठती है।
वो कोई भ्रम नहीं, कोई संयोग नहीं,
वो है तुम्हारी आत्मा की सच्ची पुकार।

तुम्हारी अंतर्ज्ञान तुम्हारी राह है,
जो हर संशय को मिटा देती है।
दिमाग भले शोर मचाए,
पर दिल की गहराई सत्य सुनाती है।

जब निर्णय कठिन हो,
और रास्ते धुंधले लगें।
तब उस नन्ही रोशनी को देखो,
जो तुम्हारे भीतर ही जल रही है।

अंतर्ज्ञान वो विश्वास है,
जो ब्रह्मांड से जुड़ा है।
ये तुम्हें गलत रास्ते पर नहीं ले जाएगा,
क्योंकि ये तुम्हारे सच्चे आत्मा का आईना है।

जो भी चुनौती हो,
उस पर विश्वास करो।
तुम्हारा दिल जानता है,
कि तुम्हें कहाँ जाना है।

सुनो, उस मौन को जो बोलता है,
देखो, उस संकेत को जो छिपा नहीं।
अंतर्ज्ञान तुम्हारा सबसे बड़ा साथी है,
बस अपनी आत्मा से संवाद करो।


आत्मा का दर्पण



सही व्यक्ति तुम्हें पूरा नहीं करता,
वो बस तुम्हारे भीतर के प्रकाश को दिखाता है।
तुम्हारी शक्ति, तुम्हारा जुनून,
तुम्हारी ऊर्जा का अद्भुत सागर जगाता है।

जब तुम स्वयं को तराशते हो,
अपने भीतर के हीरे को चमकाते हो।
सही व्यक्ति बिना खोजे आता है,
जैसे चुम्बक अपने अंश को खींच लाता है।

प्रेम खोजने की वस्तु नहीं,
ये पहचान का एक अमूल्य अनुभव है।
जब आँखें आत्मा को देखती हैं,
तो शब्दों से परे संवाद होता है।

तुम्हारी यात्रा तुम्हारी है,
प्रेम उसका साथ है जो तुम्हें समझे।
वो नहीं जो तुम्हारे अधूरेपन को भरे,
बल्कि वो जो तुम्हारे पूर्ण को झलके।

सही प्रेमी तुम्हारे भीतर का आईना है,
तुम्हारी ताकत और कमजोरियों का सहारा है।
प्रेम कोई समझौता नहीं,
ये दो आत्माओं का अद्भुत सहजीवन है।

जब तुम अपने सर्वश्रेष्ठ बनने में जुट जाते हो,
तो प्रेम अपनी राह खुद बना लेता है।
लवर्स एक-दूसरे को खोजते नहीं,
वे एक-दूसरे को आत्मा से पहचानते हैं।


प्रेम का अदृश्य संगम


प्रेमी कहीं दूर नहीं मिलते,
नहीं होता उनका कोई तय मुकाम।
वो तो सदा से एक-दूजे में हैं,
जैसे नदी में समाया हो गहराई का जाम।

मन के कोने में बसे वो अहसास,
जो बिना शब्दों के कह देते हैं बात।
नयनों की भाषा, हृदय की धड़कन,
उनका मिलन तो आत्मा का संगम।

चमकते तारे गवाह बन जाते हैं,
जब मौन में बातें होती हैं।
हवा की सरसराहट में उनका स्पर्श,
जैसे चाँदनी रातों में धीमी बूँदों का मर्म।

वो मिलते नहीं, क्योंकि अलग कभी थे ही नहीं,
जैसे छाया का अस्तित्व साये से अलग नहीं।
प्रेम कोई यात्रा नहीं, कोई मंज़िल नहीं,
ये तो आत्मा का अनंत शाश्वत प्रवाह है।

सांसों में गूंजती उनकी ध्वनि,
मन के भीतर उनकी छवि बनी।
न प्रेम सीमाओं में बंध सकता है,
न इसे किसी नाम से परिभाषित किया जा सकता है।

जैसे बीज में छिपा हो पूरा वृक्ष,
जैसे गगन में बसी हो धरती की प्यास।
प्रेमी तो सदा ही एक-दूसरे में हैं,
अदृश्य लेकिन अनंत आत्मिक निवास।


आधी-अधूरी आरज़ू

मैं दिखती हूँ, तू देखता है, तेरी प्यास ही मेरे श्रृंगार की राह बनती है। मैं संवरती हूँ, तू तड़पता है, तेरी तृष्णा ही मेरी पहचान गढ़ती है। मै...