मैं दिखती हूँ, तू देखता है,
तेरी प्यास ही मेरे श्रृंगार की राह बनती है।
मैं संवरती हूँ, तू तड़पता है,
तेरी तृष्णा ही मेरी पहचान गढ़ती है।
मैं इतराती हूँ, तू मदहोश होता है,
तेरी आँखें ही मेरे होने की गवाही देती हैं।
मैं जलती हूँ, तू सुलगता है,
तेरी चाहत ही मेरी आग को हवा देती है।
तेरे भीतर जिज्ञासा, मेरे भीतर प्रदर्शन,
तेरी नज़र ही मेरे रूप की परछाई होती है।
मैं अधूरी, तू अधूरा,
पर साथ मिलकर एक तमाशा बन जाते हैं।
दोनों की अपनी-अपनी आधी-अधूरी बीमारियाँ,
मिलकर पूरी बीमारी बन जाती हैं।
कभी जो प्रेम था, अब व्यापार सा लगता है,
इच्छाएँ जलती हैं, आत्मा कहीं खो जाती है।
तो क्या ये प्रेम है, या बस एक छलावा?
तेरी चाह और मेरा श्रृंगार,
या फिर एक अंतहीन बहलावा?
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