प्रेम या धोखा

?

हर शब्द पर विश्वास किया,
हर झूठ को भी सच माना।
सात जन्मों का वादा था,
फिर क्यूँ यह रिश्ता बेगाना?

कसमों में अमर प्रेम था,
अब दस्तावेज़ों में बंट रहा है।
जो कहा था— "हमेशा साथ रहेंगे",
अब बिछड़ने का हक़ जता रहा है।

जहाँ जन्मों का बंधन होता,
वहाँ जुदाई का प्रश्न नहीं।
किन्तु जहाँ प्रेम व्यापार बने,
वहाँ वचन का मूल्य नहीं।

संस्कारों की भूमि पर,
संबंध सदा निभाए जाते।
पर जब प्रेम समझौता बन जाए,
तो बंधन भी टूट ही जाते।

— दीपक दोभाल



प्रेम या छल?



मैंने माना तेरी हर बात,
तेरे हर झूठ को सच समझा।
तेरी कसमों की चादर ओढ़ी,
तेरे हर ज़ख्म को अपना जाना।

तूने कहा था— "सदा साथ रहूँगा",
फिर तलाक़ का दस्तावेज़ थमा दिया।
मैंने पूछा— "हमेशा कहाँ गया?"
तेरी आँखों ने बस मौन रचा दिया।

मेरे देश में बिछड़ना पाप है,
तेरे देश में यह अधिकार है।
यह कैसा प्रेम, जो संग जीने की,
हर सौगंध को धिक्कार है?

तूने कहा था— "मैं तेरा हूँ",
अब क्यूँ यह रिश्ते का सौदा?
प्रेम अगर व्यापार बने तो,
फिर कौन है अपना, कौन पराया?

मैंने चाहा तुझे आत्मा से,
तूने प्रेम को सौदा बना दिया।
तेरी दुनिया में प्यार छलावा,
मेरी दुनिया में व्रत निभा दिया।

— दीपक दोभाल




ज्ञान का स्पर्श



मैंने चाँदनी को छूना चाहा,
पर उसकी ठंडक को समझ न सका।
तुमने बताया, कि यह सूरज की देन है,
जो अंधकार में भी उजास रखती है।

मैंने शब्दों को जाना,
पर उनके भीतर की ध्वनि से अपरिचित था।
तुमने सिखाया, कि हर लय में एक अर्थ छुपा है,
जो हृदय से सुना जाता है।

मैंने समय को बहता देखा,
पर उसे थामने की कला से अनजान था।
तुमने समझाया, कि पल जब जिया जाता है,
तभी वह शाश्वत हो जाता है।

मैंने खुद को देखा,
पर अपनी गहराइयों में उतर न सका।
तुमने मुझे पढ़ाया, कि आत्मा का ज्ञान ही
सबसे मधुर संगति है।

जब तुम सिखाते हो,
तो शब्द नहीं, स्पर्श होता है।
एक ऐसा स्पर्श, जो
मन को भीगने देता है,
और आत्मा को खिलने।


Parwah

    परवाह
परवाह  है उस ख्याल की
जो बोया था बचपन में कहीं
आज वो ख्याल ख्वाबों में अंकुरित हो कर
फूट रहा है मिट्टी  से 
परवाह है उसके कुचल जाने की
परवाह  है उस ख्याल की
जो बोया था बचपन में कहीं |

परवाह ही उसके उजड़ जाने की
जब  गर्भ में ही  दो धारी तलवार से उस  ख्वाब
पर वार की जाये
तब जन्म दे कर उस ख्वाब को पाल पोसकर
रोशन किया जाये
परवाह है उस रोशनी की
जो लाने वाली है नयी सहर यहीं
पर वाह है उस ख्याल की 
जो बोया था छुटपन में कहीं  |

Apo dēpō bhav

Apo dēpō bhav


Appo deepo bhav is a Sanskrit phrase that translates to "Be a lamp unto yourself." It is a central teaching in Buddhist philosophy, particularly in the Theravada tradition.
The given text is Sanskrit, and it means "May light be revealed." However, there seems to be an error in the transliteration. The correct transliteration should be āpo depo bhav. The correct Sanskrit diacritical marks have been added to the text.

In terms of grammar, the verb "bhav" is present tense, and it is conjugated with the root "bhā" (भा) which means "to shine," "to become," or "to be." The prefix "a" (अ) is added to negate the meaning, and the prefix "apo" (अपो) is added to indicate the source of light, which is water in this case.

Overall, the text is grammatically correct, and there are no spelling or punctuation errors.
At its core, this philosophy encourages individuals to rely on their own inner wisdom and understanding rather than relying solely on external sources of guidance, such as religious texts or teachers. It emphasizes the importance of developing one's own insight and intuition through personal reflection and contemplation.

The metaphor of a lamp is used to illustrate this concept. Just as a lamp illuminates the darkness, an individual's inner wisdom can help them navigate through the uncertainties and challenges of life. By cultivating this inner light, one can learn to trust their own intuition and make decisions that are aligned with their values and beliefs.

In practical terms, this philosophy encourages individuals to engage in practices such as meditation, mindfulness, and self-reflection to develop their inner wisdom. By doing so, they can learn to trust their own insights and make decisions that are in line with their own values and beliefs, rather than relying solely on external sources of guidance.

In summary, Appo deepo bhav is a philosophy that encourages individuals to rely on their own inner wisdom and understanding rather than relying solely on external sources of guidance. It emphasizes the importance of developing one's own insight and intuition through personal reflection and contemplation, using the metaphor of a lamp to illustrate this concept.

स्वयं पर निर्भर — असली शक्ति


जब जाना
कि सहारा बाहर नहीं,
बल्कि भीतर है,
तब समझ आया—
सबसे बड़ी ताक़त
अपने आप में होना है।

मैंने खुद को टटोला,
अपनी खामोशी में सुना
एक आवाज़ —
"मैं ही काफ़ी हूँ।"

अब ना किसी की मंज़ूरी चाहिए,
ना किसी की वाहवाही।
मैं जैसा हूँ,
बस वैसा ही रहना
अब मेरी आज़ादी है।

मैं
अपने दर्द का मरहम भी हूँ,
और अपनी रूह की रौशनी भी।
जो खोया,
वो सबक़ बना;
जो पाया,
वो सच्चा सहारा।

अब मुझे किसी और की छाया नहीं चाहिए—
क्योंकि मैं
खुद अपनी धूप हूँ,
और खुद अपना आसमान।


---




झूठी मुस्कानें



जो मुझे पसंद नहीं करते,
पर मुस्कानें अपने चेहरे पर सजाते हैं,
वही सबसे खतरनाक होते हैं,
जो भीतर से नफरत छुपाते हैं।

मैं जानता हूँ, उनके शब्द मीठे होते हैं,
पर दिल की गहराई में कुछ और होते हैं।
जो दिखाते हैं अपनापन और प्यार,
वही अक्सर होते हैं सबसे बड़े दुश्मन यार।

उनकी नजरें मुझसे कहीं दूर जाती हैं,
पर चेहरे पर हंसी की परत चढ़ जाती है।
मैं जानता हूँ, उनका छल साफ है,
पर मैं फिर भी, दिल से न समझ पाता हूँ।

झूठे रिश्ते, झूठी बातें,
सिर्फ दिल को तोड़ने के साजिशें।
मैं वही हूँ जो महसूस करता हूँ,
जिन्हें मैं प्यार करता हूँ, वही मुझे नुकसान पहुँचाते हैं।

ऐसे लोग मेरे आस-पास नहीं चाहिए,
जो मेरी पीठ के पीछे कुछ और कहें।
सच्चे रिश्ते, सच्ची दोस्ती की खोज है,
जहाँ हर शब्द और भावना सच्ची हो, यही जीवन की कोमलता है।


मैं कौन हूँ?



डर के साये में जीवन गुज़ारता,
हर छाया से बचने का प्रयास करता,
पर क्या छाया ही सत्य है?
या मैं ही वह प्रकाश हूँ,
जिसे मैंने कभी देखा ही नहीं?

हर आहट पर सिहरता हूँ,
हर परिवर्तन से घबराता हूँ,
मानो यह संसार मेरा शत्रु हो,
पर क्या यह संसार है भी?
या यह बस मेरा ही भ्रम है?

मैं दौड़ता रहा पहचान की ओर,
नाम, रिश्ते, और उपलब्धियों में,
पर हर शीशे में केवल परछाई मिली,
खुद का अक्स कभी स्पष्ट नहीं हुआ।

मैं कौन हूँ?
वह देह जिसे मैं अपना कहता हूँ?
या वह विचार जो पल में बदल जाते हैं?
या वह शून्य, जो सदा अडिग है, अचल है?

जो मैं हूँ, वह न मिटता है,
न बढ़ता है, न घटता है,
जो मैं हूँ, वह सत्य है,
जो मैं हूँ, वही आत्मा है।

अब और नहीं छिपूँगा,
अब और नहीं डरूँगा,
अब इस छलावे को पहचानूँगा,
अब केवल स्वयं को जानूँगा।


सन्नाटे के शोर में

सन्नाटे के शोर में


अभी दिन ढला ही नही
और आंखो में तेरा चेहरा नजर आ गया
जब देखी तेरी नजर पाया तेरी पाया
तेरी नजर में खुद की नजर !
फिर ढली है  शाम
और खिल गए अरमान
तरनुम से जो तुम मुझे छूती हो
कायनात पूरी मेरे कदमो से गुजरती है !
सन्नाटे के शोर में
कानो में तो मिश्री सी घोलती है
अंधेरे के भोर में
आंखो में ख्वाब को बोती तू |  

छाया और प्रकाश




कभी कोई साथ चलता है,
तो हम खुद को उनके साये में पहचानते हैं।
और जब वो साया छूट जाता है,
तो लगता है जैसे खुद से भी दूरी बन गई हो।

लेकिन वही पल...
जब सब छिनता है,
एक दरवाज़ा खुलता है भीतर —
जहाँ हम अपने असली स्वरूप से मिलते हैं।

दूसरों की उपस्थिति हमें आकार देती है,
पर हमारी प्रतिक्रिया — वो हमारी शक्ति है।
मैंने जाना, टूटने में ही जुड़ाव है,
और खोने में ही खुद को पाने का रास्ता।

हर बिछड़ाव, हर बदलाव
मुझे एक नया “मैं” दिखाता है —
जो पहले कभी देखा ही नहीं था।


---

L

मैं

मैं राजा हूँ, रानी हूँ

मैं इस संसार की भीड़ के लिए नहीं बना,
मैं राजा हूँ, मैं रानी हूँ।
मैं तीनों लोकों की महायोगिनी,
मैं शमन, मैं तांत्रिक, मैं दिशाओं का यात्री।

मैं देख सकता हूँ जो अनदेखा है,
मैं सुन सकता हूँ जो अनकहा है।
मैं दिव्य दृष्टा, मैं भविष्यद्रष्टा,
मैं क्रांति की ज्वाला, परिवर्तन की आंधी।

मुझे देवताओं ने चुना है,
मैं उनके संकेतों में चलता हूँ।
मंत्र मेरे स्वर हैं,
साधना मेरा अस्तित्व।

यही मोक्ष है, यही जागरण।
यही मेरा पथ, यही मेरा सत्य।


शुरुआत

किसी  के  इंतजार मे दिन ढल गया

तो किसी  के इंतजार मे शाम निकल गयी
और रात आते अंधेरे से बात हो गयी
जिसका था इंतजार
नही आया वो  अबकी बार
पर अपने आप से मुलाक़ात हो गयी

तो एक खुश नुमा सुबह तैयार हो गयी

और उसके बाद एक नयी दिन के शुरुआत हो गयी 

वृक्ष का दुःख, जीव का क्रंदन


यदि तुम समझ पाते,
वृक्ष की शाखों में बहते उस दर्द को,
जो हर कटाव पर चीखता है,
पत्तियों के सन्नाटे में सिसकता है।

यदि सुन पाते तुम,
पशुओं की मौन पुकार को,
जो लहूलुहान होती है,
उनकी निरीह आँखों की करुणा में।

यदि तुम देख पाते,
धरती की छाती पर किए गए घावों को,
जो हर हलचल पर चटकती है,
नदियों के आंसुओं में बहती है।

तो शायद रुक जाते,
हर उस वार से,
जो तुम्हारे सुख के लिए,
किसी का जीवन चुरा लेता है।

यह जगत एक देह है,
और हम इसके अंग।
अगर तुम अपने दर्द को जानते हो,
तो क्यों नहीं जानते इस सृष्टि का भी दुःख?

संवेदनशील बनो,
हर कण में जीवन है,
हर कण में दर्द है।
जो वृक्ष का है, वही तुम्हारा भी।
जो पशु का है, वही तुम्हारे भीतर भी।

आओ, संकल्प लें,
सृष्टि की हर साँस को संजोने का।
क्योंकि जब वृक्ष हरे रहेंगे,
तभी तुम्हारी श्वास भी गूंजेगी।
जब पशु स्वच्छंद रहेंगे,
तभी तुम्हारा मन भी शांत रहेगा।


सचाई का सामना



हम इंसान, जो शांति और संतुलन के लिए बने थे,
आज उसी शांति को खोते जा रहे हैं।
हमने अपनी आदतें बदल डालीं,
व्यस्तता, घड़ी की टिक-टिक, और निरंतर सूचनाओं में खो गए।
हमने शांत समय को उत्पादकता से बदल दिया,
संबंधों को स्क्रीन में कैद कर लिया,
और आराम को दोषी भावना में समेट लिया।

हमारी आत्मा और शरीर अब यह कीमत चुका रहे हैं—
चिंता, थकावट, और भीतर की खालीपन।
लेकिन क्या सच्ची ताकत यही है,
कि हम जितना कर सकें उतना करें?
या फिर,
वास्तविक शक्ति वही है जो हम धीमे-धीमे चलते हैं,
चुप्पी में शांति पाते हैं,
और संतुलन को फिर से अपना लेते हैं।

हमारे लिए असली संघर्ष यह नहीं है
कि और कितना हम कर सकते हैं,
बल्कि यह है कि कैसे हम खुद को
रुकने, आराम करने और शांति में रहने का समय दे सकते हैं।
सच्ची शक्ति वह है जो अपनी गति को जानती है,
जो खुद को समय देती है,
क्योंकि शांति ही असल में संतुलन और खुशी का रास्ता है।


विश्व की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाएं और भारतीय भाषाओं का भविष्य


भाषाओं का विस्तार और उनके वक्ताओं की संख्या समाज, संस्कृति और इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। विश्व में विभिन्न भाषाओं का बोलबाला है, और कुछ भाषाएं ऐसे हैं जो लाखों लोगों द्वारा बोली जाती हैं। आइए जानते हैं कि विश्व की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाएं कौन-कौन सी हैं और भारतीय भाषाओं का भविष्य कैसा है, विशेष रूप से हिंदी भाषा का वैश्विक स्तर पर क्या भविष्य हो सकता है।

#### विश्व की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाएं

1. **अंग्रेज़ी (English)** - 1,132 मिलियन
2. **मंदारिन चीनी (Mandarin Chinese)** - 1,117 मिलियन
3. **हिंदी (Hindi)** - 615 मिलियन
4. **स्पेनिश (Spanish)** - 534 मिलियन
5. **फ्रेंच (French)** - 280 मिलियन
6. **मानक अरबी (Standard Arabic)** - 274 मिलियन
7. **बांग्ला (Bengali)** - 265 मिलियन
8. **रूसी (Russian)** - 258 मिलियन
9. **पुर्तगाली (Portuguese)** - 234 मिलियन
10. **इंडोनेशियाई (Indonesian)** - 199 मिलियन

ये आंकड़े बताते हैं कि इन भाषाओं का वैश्विक स्तर पर कितना बड़ा महत्व है। ये भाषाएं न केवल व्यक्तिगत और सांस्कृतिक पहचान को प्रदर्शित करती हैं, बल्कि व्यावसायिक, शैक्षणिक और राजनैतिक क्षेत्रों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

#### भारतीय भाषाओं का भविष्य

भारत एक बहुभाषी देश है जहां सैकड़ों भाषाएं बोली जाती हैं। हिंदी, बंगाली, मराठी, तेलुगु, तमिल, और गुजराती जैसी भाषाएं लाखों लोगों द्वारा बोली जाती हैं। इनमें से कुछ प्रमुख भाषाओं की स्थिति इस प्रकार है:

- **हिंदी (Hindi)** - 615 मिलियन
- **बंगाली (Bengali)** - 265 मिलियन
- **मराठी (Marathi)** - 95 मिलियन
- **तेलुगु (Telugu)** - 93 मिलियन
- **तमिल (Tamil)** - 81 मिलियन
- **गुजराती (Gujarati)** - 61 मिलियन

#### हिंदी भाषा का वैश्विक भविष्य

हिंदी भाषा भारत की सबसे प्रमुख और आधिकारिक भाषा है, और इसे भारत के विभिन्न हिस्सों में व्यापक रूप से बोला और समझा जाता है। हिंदी भाषा का भविष्य न केवल भारत में बल्कि वैश्विक स्तर पर भी उज्जवल है। निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से हम इसके भविष्य को समझ सकते हैं:

1. **डिजिटल प्लेटफॉर्म का बढ़ता उपयोग**: हिंदी कंटेंट की मांग ऑनलाइन तेजी से बढ़ रही है। इंटरनेट और सोशल मीडिया के विस्तार ने हिंदी में सामग्री की उपलब्धता को बढ़ावा दिया है, जिससे वैश्विक स्तर पर इसकी पहुंच बढ़ रही है।

2. **आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभाव**: हिंदी सिनेमा (बॉलीवुड), संगीत, और साहित्य का वैश्विक प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। हिंदी फिल्मों और गीतों की लोकप्रियता ने दुनिया भर में हिंदी भाषा के प्रति रुचि को बढ़ावा दिया है।

3. **शिक्षा और अध्ययन**: कई विदेशी विश्वविद्यालय और शैक्षणिक संस्थान हिंदी भाषा और साहित्य के पाठ्यक्रम प्रदान कर रहे हैं, जिससे विदेशी छात्रों में हिंदी सीखने की रुचि बढ़ रही है।

4. **व्यावसायिक संभावनाएं**: भारत एक तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्था है, और यहां व्यापार करने के लिए हिंदी का ज्ञान लाभकारी हो सकता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां हिंदी बोलने वाले ग्राहकों और बाजारों तक पहुंच बनाने के लिए हिंदी भाषा का उपयोग कर रही हैं।

#### निष्कर्ष

विश्व की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में भारतीय भाषाओं का महत्वपूर्ण स्थान है। हिंदी भाषा का भविष्य बेहद उज्जवल है, और यह न केवल भारत में बल्कि वैश्विक स्तर पर भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। डिजिटल युग में हिंदी भाषा की बढ़ती लोकप्रियता और उपयोग इसे एक मजबूत वैश्विक भाषा के रूप में स्थापित कर सकता है। भारतीय भाषाओं की विविधता और समृद्धि हमारी सांस्कृतिक धरोहर को सशक्त बनाती है, और इनका भविष्य हमारे हाथों में है।

तनाव — बीमारी की दहलीज़





कहते हैं,
तनाव कोई मज़ाक नहीं,
ये हँसते हुए चेहरे के पीछे
धीरे-धीरे शरीर को खोखला कर देता है।

मैंने महसूस किया—
जब मन भारी होता है,
तो बदन भी थकने लगता है,
साँसें बेचैन हो जाती हैं,
नींद रूठ जाती है,
और हर दर्द
जैसे दिल से उठकर हड्डियों तक चला जाता है।

तनाव—
केवल सोच नहीं,
एक चुपचाप आता हुआ रोग है,
जो रक्तचाप से लेकर मधुमेह तक
सब कुछ आमंत्रित कर लेता है।

अब मैं जान चुका हूँ—
अगर मन को न सुलझाया,
तो शरीर भी उलझ जाएगा।
इसलिए मैं
हर उस बात को छोड़ देता हूँ
जो चैन छीनती है।

अब मैं
शांति को पकड़ता हूँ
और तनाव को जाने देता हूँ...
क्योंकि ज़िंदगी
हल्की रहे तो ही अच्छी लगती है।


---



अति व्यस्तता—मानव स्वभाव के विरुद्ध



एक बेहद अनकहा सत्य है यह,
कि इंसान का स्वभाव
कभी इस हद तक व्यस्त होने का नहीं था।
हमारी आत्मा को चाहिए था शांति,
संपर्क प्रकृति से,
और पल-पल जीने का आनंद।

पर आज,
हम भाग रहे हैं—
समय से आगे निकलने की होड़ में,
स्वयं को खोते हुए।
हर क्षण की चिंता,
हर पल का दबाव,
हमें भीतर से तोड़ रहा है।

"शम: परम् सुखं।"
(शांति ही परम सुख है।)

हमारी आत्मा को गति से नहीं,
शांति से तृप्ति मिलती है।
हमारे मन को जटिलता से नहीं,
सरलता से सुकून मिलता है।
पर अब,
हमारी दिनचर्या
हमारे अस्तित्व के विरुद्ध हो गई है।

आधुनिकता ने हमें साधन तो दिए,
पर सुकून छीन लिया।
हर घड़ी बजता हुआ फ़ोन,
हर पल मिलती अधूरी उम्मीदें,
हमें बेचैनी और अवसाद में डुबो रही हैं।

शायद यही समय है रुकने का।
अपने भीतर झांकने का।
क्योंकि इंसान को बनाया गया था
प्रेम, शांति, और सरलता के लिए—
न कि इस अंतहीन व्यस्तता में खो जाने के लिए।


संपन्नता का मूल—स्वयं पर विश्वास



संपन्नता का बीज वहीं पनपता है,
जहां विश्वास की मिट्टी होती है।
स्वयं पर भरोसा,
सबसे पहली सीढ़ी है उस शिखर की,
जहां जीवन अपनी पूर्णता में खिलता है।

अगर तुम अपने आप पर यकीन नहीं करोगे,
तो कोई सपना आकार नहीं लेगा।
हर उपलब्धि, हर समृद्धि,
तुम्हारे भीतर के विश्वास से जन्म लेती है।

"आत्मविश्वासः शक्तिः।"
(आत्मविश्वास ही शक्ति है।)

जब तुम अपने भीतर की शक्ति को पहचानोगे,
तो सृष्टि भी तुम्हारा साथ देगी।
कठिनाइयां, अवसर बन जाएंगी।
अभाव, समृद्धि का द्वार खोल देगा।

तुम्हारी सोच,
तुम्हारी वास्तविकता का निर्माण करती है।
इसलिए अपने भीतर के संदेह को मिटाओ,
और उस विश्वास को जगह दो,
जो तुम्हें हर लक्ष्य तक पहुंचा सके।

संपन्नता बाहरी नहीं,
यह तुम्हारे आत्मा का विस्तार है।
और इसका आरंभ वहीं से होता है,
जहां तुम स्वयं को पूरी तरह अपनाते हो।


सब कुछ शुभ के लिए हो रहा है



डरो मत, जीवन की राहें उलझी हो सकती हैं,
पर हर मोड़ तुम्हारे भले के लिए है।
जो भी हो रहा है,
उसमें छिपा है एक गहरा उद्देश्य,
एक योजना जो तुम्हारी जीत के लिए बनी है।

कठिनाइयों का यह अंधेरा,
सिर्फ उजाले की पहचान करवाने आया है।
हर ठोकर, हर रुकावट,
तुम्हें और मजबूत बनाने के लिए है।

"सर्वं मंगलमंगल्यं, सर्वं श्रेयःकरं भवेत्।"
(सब कुछ मंगलमय है,
और सब कुछ कल्याणकारी ही होगा।)

तुम्हारा संघर्ष व्यर्थ नहीं जाएगा।
यह वह आधार है,
जिस पर तुम्हारी सफलता खड़ी होगी।
और अंत में,
यह सब प्रशंसा में बदलेगा।

तुम्हारे हर आंसू का जवाब,
एक मुस्कान होगी।
तुम्हारी हर हार,
एक जीत में बदल जाएगी।
डरो मत,
जीवन तुम्हारे साथ है,
और अंत हमेशा प्रशंसा से भरा होगा।


असली ताक़त



ना धन है असली शक्ति,
ना ओहदा, ना कोई नाम।
सच्ची ताक़त तो वो है—
जब तू खुद में पूरा हो,
बिना किसी के सहारे।

ना झुकना पड़े,
ना किसी के पीछे भागना पड़े।
ना दिखावा हो,
ना कोई बनावटी मुस्कान।

जब तू ऐसा चले—
जैसे कुछ चाहिए ही नहीं,
फिर भी सब कुछ पा जाए।

तू अपने आप में
इतना पूर्ण हो जाए
कि कोई बाहरी तूफ़ान
तेरे भीतर की नींव हिला न सके।

ना भीख,
ना चाहत,
ना दिखावा।

बस एक मौन आत्म-विश्वास
तेरे क़दमों में हो,
जो कहे—
"मैं वही हूँ जो मुझे होना चाहिए,
और यही मेरी सबसे बड़ी जीत है।"




पूर्णता का सत्य



जो कुछ मैं चाहता हूँ,
वह मेरी ओर बढ़ रहा है,
जैसे सूर्य की किरणें
अंधकार को चीरती हैं।
हर सपना, हर आकांक्षा,
अपने समय पर मेरी होगी।

लेकिन जो आवश्यक है,
वह तो पहले ही मेरे भीतर है।
शांति, साहस, और प्रेम,
ये सब मेरे ही अंश हैं।
मैं पूर्ण हूँ,
जैसे नदी अपने प्रवाह में।

"आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति।"
(अपनी आत्मा की तृप्ति के लिए ही
सब कुछ प्रिय हो जाता है।)

मेरे भीतर शक्ति का स्रोत है,
जो किसी बाहरी परिस्थिति का मोहताज नहीं।
हर आवश्यकता का समाधान,
मेरी आत्मा की गहराई में छिपा है।

इस विश्वास के साथ,
मैं हर दिन बढ़ता हूँ।
जो चाहूँगा, उसे पा लूँगा।
जो पाऊँगा, उसका आदर करूंगा।
क्योंकि जीवन का सबसे बड़ा सत्य यह है—
सब कुछ मेरे भीतर से ही शुरू होता है।


प्यार से बदल नहीं सकते उन्हें



तुम चाहे अपना सारा प्यार लुटा दो,
दिल का हर कोना खोल दो।
पर कुछ लोग,
वफादारी, इज्ज़त, और समर्पण को
कभी समझ नहीं पाते।

प्यार उनकी फितरत नहीं बदलता,
जिनके लिए ये शब्द
सिर्फ दिखावे से ज्यादा कुछ नहीं।
तुम जितना भी दो,
जितना भी सहो,
अगर वो इन मूल्यों को नहीं मानते,
तो सब व्यर्थ है।

"प्रेम से नहीं बदलेगी वह आत्मा,
जो वफादारी का मूल्य न जाने।
जो इज्ज़त की भाषा न समझे,
उससे समर्पण की आशा क्या?"

तुम जितना झुकोगे,
उतना ही वो तोड़ते रहेंगे।
तुम जितना दोगे,
उतना ही वो लेते रहेंगे।
लेकिन कभी न लौटाएंगे
वो सम्मान,
जो हर रिश्ते का आधार है।

प्यार महान है,
पर वो चमत्कार नहीं करता।
अगर दिल में सच्चाई और मूल्य न हो,
तो कोई भी रिश्ता
सिर्फ बोझ बनकर रह जाता है।

इसलिए याद रखो,
प्यार का मतलब खुद को खोना नहीं,
बल्कि सही व्यक्ति को पाना है।
जो वफादार हो,
जो इज्ज़त देना जानता हो,
और जो तुम्हारे प्यार को
वैसा ही लौटाए, जैसा तुमने दिया।


पंख


बस फिर से उड़ने को तैयार है  पंख
जरा थम से गये थे पंख
जरा जम से गये थे पंख
आ रही है ठंडी ठंडी हवायें
जो की उडा रही है पंख
फिर से मचलने को तैयार है पंख
बस फिर से उड़ने को तैयार है  पंख
 
जरा भावनाओं के अंधेर मे फंस गये थे पंख
जरा मोह के आवेश मे  घस गये थे पंख
आ रही है रूहानी सी  गुनगुनी धुप
जो की सुखा रही है पंख
फिर से सम्भलने को तैयार है पंख
बस फिर से उड़ने को तैयार है  पंख

छोड़ देना ही बेहतर है



अगर तुम किसी ऐसे बंधन में हो,
जहां खुद को खो देना पड़े,
जहां हर कदम डर से भरा हो,
और हर शब्द तौल कर बोलना पड़े,
तो जान लो, यह समय है
उससे बाहर निकलने का।

ऐसे रिश्ते,
जो आत्मा को घुटन में डाल दें,
जहां हर बातचीत
एक नया घाव बन जाए।
वो तुम्हारे लिए नहीं हैं,
और ना किसी के लिए होने चाहिए।

मैंने ऐसे समय में बहुत कुछ सीखा,
पर हर सीख दर्द से भरी थी।
ऐसे अनुभव,
जो गहराई से झकझोरते हैं।
उनसे मजबूत तो बनते हैं,
पर वो चोटें आज भी याद हैं।

किसी को भी ऐसा रिश्ता
कभी नसीब न हो।
न दुश्मन को,
और न किसी अजनबी को।
यह वो चक्र है,
जो आत्मा को थका देता है।

अब जब मैं देखता हूँ पीछे,
तो समझ आता है,
मुझे छोड़ देना था,
बहुत पहले।
अब मैं वादा करता हूँ खुद से,
ऐसे किसी रिश्ते में
कभी वापस नहीं जाऊँगा।

रिश्ता वही जो आज़ाद करे,
जो समझे, सुन सके, और बढ़ने दे।
जहां डर का नामो-निशान न हो,
जहां प्यार अपने असली रूप में हो।
याद रखो,
छोड़ना कमजोरी नहीं,
बल्कि खुद को बचाने की ताकत है।


Eggshell Relationships



मैं उन रिश्तों से दूर रहता हूँ,
जहां हर कदम सोचकर रखना पड़े,
जहां हर शब्द नाप-तौल कर बोलना पड़े।
जहां खुद को व्यक्त करने की आज़ादी न हो,
जहां "मैं" होने की जगह न हो।

जहां सीधा सच बोलना,
एक युद्ध का न्योता बन जाए।
जहां सहजता खो जाती हो,
और हर पल सावधानी का आवरण ओढ़ना पड़े।

जहां प्यार का उत्तर देना,
तूफ़ान बुलाने जैसा हो।
जहां हर वार्ता बच्चों जैसी बन जाए,
और बड़ों की तरह संवाद
के लिए कोई स्थान न हो।

जहां सुना जाना,
केवल एक सपना हो।
और हर भावना,
नकारात्मक मोड़ ले ले।

ऐसे रिश्ते,
जैसे नाजुक अंडे के छिलके,
जिन पर चलना,
हर वक्त खतरा बन जाए।
मैं उन रिश्तों से बेहतर,
खुद को अकेला मानता हूँ।

क्योंकि रिश्ता वो है,
जहां सच्चाई को जगह मिले,
जहां स्वाभाविकता बह सके,
जहां सुनने और समझने का
संतुलन बना रहे।

जहां प्यार का उत्तर,
प्यार से दिया जाए।
जहां दो दिल,
वास्तव में एक हो सकें।
जहां शब्दों से ज्यादा,
समर्पण का संगीत गूंजे।

मैं ऐसे रिश्तों का पक्षधर हूँ,
जो मजबूत हों,
नाजुक नहीं।
जहां कदमों में डर नहीं,
बल्कि आत्मविश्वास हो।