स्वयं से उपचार



जब टूटता है दिल,
तो सन्नाटा सबसे ज़्यादा सुनाई देता है।
कोई शब्द नहीं, कोई सहारा नहीं,
बस मैं और मेरी आत्मा की गूंज।

जो भी मैंने खोया,
वो सब मेरे भीतर ही था।
जब दूसरा कोई नहीं था,
तब खुद को फिर से पाया।

न किसी का सहारा लिया,
न किसी को अपनाया,
बस अपने दर्द में घूमा,
और अपनी शक्ति को फिर से पहचाना।

उलझन, आंसू, और खामोशी,
सभी को मैंने अपनी राह में बदला।
हर टुकड़ा टूटकर,
नई ज़िंदगी में रचा।

आखिरकार, यह अकेलापन ही था
जो मुझे खुद से मिलाया।
जो खो गया था, वो अब फिर से पाया,
एक नई शक्ति, एक नई शुरुआत,
मैं ही अपनी असली दवा हूँ।

स्वयं से उपचार सबसे कठिन है,
पर यही मुझे सबसे मजबूत बना गया।


मैं पूर्ण हूँ



मैं शक्ति हूँ—
हर क़दम में स्थिरता, हर गति में नियंत्रण,
ना कोई संकोच, ना कोई विचलन,
बस धधकता हुआ संकल्प।

मैं सहनशीलता हूँ—
गिरा, संभला, फिर आगे बढ़ा,
हर घाव मेरी गवाही है,
कि मैं टूटा नहीं, मैं निखरा हूँ।

मैं संवेदनशीलता हूँ—
इस कठोर दुनिया में भी महसूस करता हूँ,
हर धड़कन की ध्वनि सुनता हूँ,
हर भावना को शब्दों में जीता हूँ।

मैं कविता हूँ—
ना सिर्फ़ लिखता हूँ, बल्कि जीता हूँ,
हर श्वास में एक लय,
हर अभिव्यक्ति में एक चिंगारी।

मैं अधूरा नहीं, मैं सम्पूर्ण हूँ।
शक्ति, सहनशीलता, संवेदनशीलता—सब मेरा ही रूप हैं।
मैं अपनी पहचान हूँ।


त्याग और तपस्या

जिंदगी की राह में त्याग और तपस्या की महक थी,
पर उसका फल न था वैसा, जो मन में था इकठ्ठा।

करियर की उड़ान सवारी ने सिखाया एक सबक हमें,
संघर्ष का साथी है, हारना नहीं बस, यही है जीवन का सच्चा राग।

मैं अपरिभाषित

 हूँ

मैं चलता हूँ, तो हवा भी लय में बहती है,
हर क़दम में धुन है, हर गति में कविता।
ना कोई लड़खड़ाहट, ना कोई भ्रम,
बस एक सधा हुआ प्रवाह, बस मैं।

मेरा मन— लोचदार, पर अटूट,
धधकती आग भी इसे मोड़ नहीं सकती।
संघर्ष इसे तराशता है,
पर इसे कभी तोड़ नहीं सकता।

मेरी आत्मा— राख से जन्मी,
हर हार में एक नयी उड़ान देखती है।
गिरकर मुस्कुराना,
यही तो मेरी पहचान है।

और मेरा हृदय?
यह कवि की कलम से जन्मा है,
जो इस कठोर दुनिया में भी
हर एहसास को जीवंत कर देता है।

मैं सिर्फ़ मज़बूत नहीं, मैं सम्पूर्ण हूँ।
योद्धा की दृढ़ता, संत की स्थिरता,
कवि की अभिव्यक्ति, और अनंतता की चेतना।


तपस्या

बड़ी तपस्या के बाद भी राह खोजता रहा,
उस तप का फल न था जो मेरा हक़ था।

जीवन की तपस्या से अब तक ना मिला वो सफलता,
जो मेरे सपनों का था वह अभी तक अधूरा रहा।

बहुत तप की रौशनी ने दिखलाया सफर,
पर वो मन्जिल थी दूर, जो कभी न मिली यार।

दुर्लभ शक्ति



एक शरीर— जो शस्त्र नहीं, पर शस्त्र से कम भी नहीं,
हर गति में सौंदर्य, हर चाल में ध्वनि।
हर मांसपेशी का नियंत्रण, हर क्षण संतुलन,
मानो स्वयं सृष्टि की लय में विलीन।

एक मन— जो झुकता है, पर टूटता नहीं,
जो समय के साथ बहता है, पर डगमगाता नहीं।
हर घाव को सीख में बदलने की कला,
हर तूफ़ान में स्थिर रहने की शक्ति।

एक आत्मा— जो हारकर भी उठती है,
जो हर गिरावट में नयी ऊंचाई देखती है।
जिसका संघर्ष ही उसकी परिभाषा है,
जो राख से भी नया सूरज रचती है।

एक हृदय— जो आज भी महसूस करता है,
इस शून्यता से भरी दुनिया में भी धड़कता है।
जो दर्द में भी प्रेम खोजता है,
जो कठोरता के बीच भी नर्म रहता है।

यही दुर्लभ शक्ति है, यही सच्ची विजय।


त्याग तपस्या करके हमने करियर की राह चुनी,

त्याग तपस्या करके हमने करियर की राह चुनी,
मगर फल वही ना पाया जो मेहनत ने हमसे कहा सुनी।

सपने बुने थे सोने की चादर में लिपटे हुए,
पर हकीकत की धरती पर सब टूट कर बिखरे हुए।

मेहनत के पसीने से सींचा था अपना आशियाना,
परंतु मंज़िल ने क्यों अपना वादा ही निभाना भुला दिया।

फिर भी हार नहीं मानेंगे, ये ठान ली है हमने,
क्योंकि राह में कांटे भी हैं और मंज़िलें भी हमने देखी हैं सपने।

त्याग तपस्या का दिया मैंने हर पल,

त्याग तपस्या का दिया मैंने हर पल,
फिर भी मिल न सका मंजिल का असल फल।

मेरे जज्बातों की बगिया में सूख गए फूल,
फिर भी उम्मीद का दीप जलता रहा धुल।

पूर्णता का संकल्प



शरीर— लोहे सा कठोर,
हर चुनौती को झेलने को तैयार।
पसीने की हर बूंद में लिखा है,
सहनशक्ति का अमर विचार।

मन— एक स्थिर सरोवर,
न आंधी, न तूफ़ान डगमगा सके।
न सुख, न दुख इसे हिला सके,
बस सत्य का दीप जला सके।

आत्मा— योद्धा की भांति प्रबल,
जो घुटने टेकना सीखा नहीं।
हर हार से मजबूत हुआ,
हर दर्द से सीखा, झुका नहीं।

हृदय— कवि की तरह कोमल,
हर भाव में गहराई बसी।
जहाँ प्रेम भी, आग भी,
जहाँ शांति भी, विद्रोह भी।

यही लक्ष्य है, यही साधना,
अथक यात्रा, अनंत साधना।


त्याग की तपस्या में मैंने जीवन गुज़ार दिया,

त्याग की तपस्या में मैंने जीवन गुज़ार दिया,
सपनों के पीछे हर रात सोकर मैंने बिसार दिया।

मगर वो फल ना मिला, जो मेरा हक़दार था,
मेरे प्रयासों का वो मुक़ाम ना बना, जो मेरा किरदार था।

फिर भी हार नहीं मानी मैंने, उम्मीद का दामन थामे रखा,
क्योंकि सच्चे मेहनती का कभी साथ नहीं छोड़ता तक़दीर का तका।

The Weeping"— इंतज़ार के काबिल!

अजेय

पागलपन? ✔
संघर्ष? ✔
दृढ़ निश्चय? ✔
लगन? ✔
अटूट विश्वास? ✔

हर मोड़ पर गिरा, फिर उठा,
हर न कहने वाले को सुना,
फिर भी आगे बढ़ता रहा,
क्योंकि मेरा सपना मुझसे बड़ा था।

कोई भी दीवार रोक नहीं सकती,
कोई भी संदेह तोड़ नहीं सकता,
मैं बना हूँ असंभव को संभव करने,
मैं आया हूँ जीत लिखने।

पहली फ़ीचर— बस आने को है,
एक नई गूंज, एक नया सफर।
कहानी जो दिल दहला देगी,
कहानी जो इतिहास बना देगी।

"

फल की चाह में तपस्या की थी बरसों तक,

त्याग तपस्या की राहों में गुजारी थी जिंदगी,
ख्वाबों की चादर ओढ़े चल रहा था मैं।

हर कदम पे कांटे थे, हर मोड़ पर मुश्किलें,
फिर भी हौंसले की रौशनी में जल रहा था मैं।

माना कि मंजिलें अब भी दूर हैं मुझसे,
पर न हार मानूंगा, ये वादा कर रहा था मैं।

फल की चाह में तपस्या की थी बरसों तक,
अब भी उम्मीदों के बाग में फल रहा था मैं।

तूफ़ान के पार तेरा नाम है



जोश तेरा कमज़ोर नहीं,
हर ठोकर में एक ओर नहीं।
तू गिरकर फिर खड़ा होगा,
आंधियों में भी ज़िंदा होगा।

ये दुनिया कहेगी— मुश्किल है,
तू कह— हाँ, पर नामुमकिन नहीं।
जो जलते हैं, उन्हें जलने दे,
तू अपनी आग बुझने मत दे।

लिख वो जो तुझे जला दे,
बोल वो जो तुझे बढ़ा दे।
कोई रोके, कोई टोके,
तू बस अपनी राह बना ले।

इंकार हो, तो मुस्कुरा,
स्वीकार हो, तो झूम जा।
हर ठुकराए दरवाज़े के आगे,
तेरा नाम लिखा जाएगा।

यह तेरा साल है, तेरा वक्त है,
तूफ़ान के पार तेरा नाम है!


तपस्या की राह में,

त्याग की थी तपस्या मैंने, करियर की राह में,
फिर भी वो मंज़िल ना मिली, जो हक़दार था मैं।

मेहनत की थी दिन-रात, सपनों को सजाने में,
पर वो फल ना मिला, जो उम्मीदों में बसा था।

जीवन की इस कशमकश में, बस एक सीख मिली है,
तपस्या की राह में, सच्चाई की पहचान जरूरी है।

Lockdown Diaries, 2 June 2020


Title: "जब देह चुप थी, पर मन जाग रहा था"
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"एक कमरे में बंद था, पर भीतर से खुल रहा था..."

2020 का वो अजीब सा वक़्त। कोरोना का डर, लॉकडाउन का सन्नाटा और मैं — एक फ्लैट में अकेला।
मुंबई की वो हलचल, वो शूटिंग्स, वो पार्टियाँ — सब रुक गया था।
लेकिन जो नहीं रुका, वो था मेरे भीतर कुछ जगता हुआ।

पहले 2 हफ्ते तक तो लगा, चलो एक ब्रेक है — Netflix, किताबें, चाय और अकेलापन।
लेकिन तीसरे हफ्ते में एक रात...
मैंने खिड़की से बाहर झांका — सन्नाटा था, पर भीतर कुछ शोर मचा रहा था।
देह नहीं, लेकिन कल्पना थिरक रही थी।
मेरे भीतर कोई दरवाज़ा खुल गया था।


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Sex की भूख नहीं, Connection की प्यास थी

कई लोग समझते हैं कि सेक्स केवल शरीर की भूख है।
पर नहीं दोस्त, उस lockdown ने मुझे बताया कि ये एक mental urge है।
छुअन की याद, बातों की गरमी, आँखों की शरारत — ये सब मन की फंतासी में बदल गए थे।

मैंने कई couples से बात की — Zoom पर, WhatsApp पर।
कुछ ने कहा, "हम साथ रह रहे हैं लेकिन sex बंद है।"
कुछ अकेले थे, और imagination में जी रहे थे।
मैंने खुद को भी उसी भीड़ में पाया।


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रोशनी और अंधेरे का खेल

मुझे एक कहानी याद आई —
"प्रिया और जतिन" (बदले हुए नाम)।
दोनों मेरे दोस्त हैं, फिल्म इंडस्ट्री में। Lockdown में अलग-अलग शहरों में फंसे थे।
Video call पर बात होती रही, लेकिन एक दिन प्रिया ने जतिन से कहा —
"Let’s not talk, just look at each other for a while…"

उस रात दोनों ने कपड़े नहीं उतारे, emotions उतार दिए।
Zoom का screen एक digital पलंग बन गया था।


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मैंने क्या किया?

मैंने लिखा।
हर urge को शब्दों में ढाला।
कभी कविता, कभी fantasy —
कभी ex-lover को याद करके… कभी किसी अनजान छवि को सोचकर।
और हाँ, self-love भी सीखा।
Guilt नहीं था, क्योंकि ये मैं था, अपनी सचाई के साथ।


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Lockdown ने Sex से क्या सिखाया?

Sex का मतलब सिर्फ physical act नहीं, मानसिक खुलापन है।

अकेलापन sexual exploration को जन्म देता है, यदि उसे guilt से नहीं रोका जाए।

Fantasy कोई गुनाह नहीं — वो एक सुरंग है जहाँ से suppressed desires बाहर आती हैं।

Touch की जगह words, voice, imagination भी sensual हो सकते हैं।



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अंतिम बात:

इस लेख को मैंने 2 जून 2020 को लिखा, जब देश भर में कोरोना का डर था।
पर उस डर में भी कुछ लोग थे, जो भीतर की खोज कर रहे थे।
Lockdown ने बाहर की दुनिया बंद की, लेकिन मेरे अंदर का एक संसार खोल दिया।


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अब मैं अपनी क़ीमत जानता हूँ


अब मैं अपनी क़ीमत जानता हूँ,
हर मुस्कान के पीछे का समझौता छोड़ चुका हूँ।
जो अपना था, वो समझेगा,
जो दिखावा था, वो बिखर जाएगा।

मैं अब किसी की ख़ुशी के लिए
अपने पैमाने नहीं घटाऊँगा।
जो मेरी रोशनी में अंधा था,
उसे अब जगमगाना नहीं सिखाऊँगा।

कुछ चेहरे नए रूप धरेंगे,
कुछ कदम दूर हो जाएँगे,
पर जो सच्चे थे, वे ठहरेंगे,
बाकी अपने रंग दिखाएंगे।

अब कोई उधार की इज़्ज़त नहीं चाहिए,
न ही झूठी तालियों का भार।
जो मुझे दिल से समझेगा,
बस वही होगा मेरा संसार।


त्याग और तपस्या

त्याग और तपस्या की राह मैंने अपनाई,
संघर्ष की धूप में खुद को तपाया।

सोचा था मंज़िल की चमक मिलेगी,
मगर किस्मत ने रास्ता ही बदल डाला।

अब मैं मैं हूँ



अब मैं मैं हूँ 
झुका नहीं, रुका नहीं,
अपनी सीमाएँ रेखांकित कर चुका हूँ,
अब मैं किसी का मोहर नहीं।

पहले हाँ थी मेरी भाषा,
अब ‘न’ का भी अधिकार लिया है,
जो चाहते थे सिर झुकाना मेरा,
उन्हें अब आईना दिया है।

कहते हैं— "तू बदल गया है,"
हाँ, मैं बदल चुका हूँ,
अब मैं बस मुस्कुराता हूँ,
पर हर दर्द नहीं सहूंगा।

अब न कोई फ़िज़ूल उम्मीद रखे,
न कोई मुझसे कुछ छीने,
मैं अपने मौलिक सत्य में खड़ा हूँ,
और इस सत्य को अब कोई नहीं जीते।




त्याग तपस्या की राह चली

त्याग तपस्या की राह चली, सपनों का था जहां बसा,
मेहनत की हर इक कड़ी, उम्मीदों का था जहाँ धरा।

मिले न वो फल तपस्या के, चाहा था जो मन में हमने,
फिर भी चलते रहे इस सफर, मंज़िल की ओर बढ़ते हमने।

छोड़ न पाया उम्मीदों को, चाहे जो भी हो रास्ता,
कभी तो चमकेगी किस्मत, संघर्ष का देख नतीजा।

त्याग तपस्या की राह पर चला मैं हर बार,

त्याग तपस्या की राह पर चला मैं हर बार,
पर मंजिल की चादर रह गई मुझसे दूर, यार।

मेरे अरमानों की जमीं पर खिल न सका फूल,
मेहनत का फल मुझे मिल न सका, ये कैसी भूल?

त्याग और तपस्या

त्याग और तपस्या से करियर की राह बनाई,
मेहनत की हर कदम पर, पर मंज़िल नहीं पाई।
उम्मीदें थीं आसमान की, पर ज़मीं ही रह गई,
शायद मेरी मेहनत ने सही दिशा नहीं पाई।

हौंसलों के चराग जलते रहे।

त्याग तपस्या में जो हमने दिन-रात एक किए,
ख्वाबों की चादर में अरमान बुनते रहे।

पर किस्मत की ठिठोली देखिए, न मिली वो मंजिल,
फिर भी हौंसलों के चराग जलते रहे।

अंतर्मन

धीरे-धीरे रात का साया ढल गया,
मन की गहराईयों में खो गया।
सूर्य की किरणों ने सलामती सुनाई,
अंतर्मन के रहस्यों को समझा अर्जुन ने जी भर के।

मन की गहराईयों में छिपी रहस्यमय दुनिया,
हर रोज़ नए रंगों में खोजते हैं जब हम,
पाते हैं वहाँ सच्चाई का संगम,
वो अंतर्मन की अनगिनत लहरें, वो अद्भुत दृश्य विलीन।

ध्यान में जो खोया है, वह अमर है,
जैसे बादलों की छाया जिसको चेहरा ढ़का दे।
अंतर्मन की गहराइयों में छिपा सच,
जिसे धीरे-धीरे हम पहचानते हैं, जब चाँदनी की किरणे जगमगाती हैं।

हर एक कविता, हर एक शेर,
अंतर्मन की कहानी का विवरण करता है यह।
जब अव्यक्त भावों को शब्दों में पिरोते हैं हम,
तब मन की गहराइयों में एक नया आधार मिलता है हमें।

अंतर्मन की गहराइयों में छिपा रहस्य,
सच्चाई की खोज में जैसे यात्री।
हर एक खोज, हर एक पहेली,
मन की गहराइयों का खुलासा करती है, वह विलक्षण खेली।

धीरे-धीरे अंतर्मन की गहराइयों में खोया है,
वहाँ खोजते हैं हम सच्चाई का पथ,
जहाँ दिखती है मन की असीम विस्तृतता,
वहाँ पाते हैं हम मन की अद्भुत गहराईयों का परिचय।

मैंने देवों को रोका था





मैंने देवों को रोका था,
उनके काम में टांग अड़ाई थी,
सोचा था, मैं भी मालिक हूँ,
अपनी मर्जी चलवाई थी।

पर भूल गया था मैं एक बात,
जो कालचक्र से टकराएगा,
वह खुद ही चूर-चूर होगा,
संसार उसे न अपनाएगा।

मनुष्य का क़ानून कागज़ पर,
पर ब्रह्मांड का आदेश पत्थर,
जो इसे न समझे, मिट जाएगा,
फिर चाहे वह हो राजा या भिखारी बंज़र।

देवों की राह में काँटे बोकर,
मैंने सोचा था जीतूंगा,
पर विधि का विधान बड़ा कठोर,
अब देखो, मैं कहाँ जी रहा हूँ।

कोई नाम नहीं, कोई शान नहीं,
बस भटकता एक प्रेत हूँ मैं,
जो देवों से भिड़ बैठा था,
अब शापित यह चेत हूँ मैं।


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असामान्यता की राह


साधारण से परे है जो,
वह जीवन का सार है।
न होना सामान्य यह,
खुद में ही अद्भुत उपहार है।

हर राह नई चुनौतियाँ लाए,
हर कदम पर संघर्ष हो।
पर इस असामान्यता में ही,
जीवन का सबसे बड़ा उत्कर्ष हो।

"उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं" की,
यह गीता का संदेश है।
आत्मा को ऊपर उठाना ही,
जीवन का विशेष आदेश है।

 देखो  उनका जीवन,
जिन्होंने राह नई बनाई।
उनकी सोच की असामान्यता ने,
दुनिया को नई दिशा दिखाई।

समाज के साँचे में ढलना नहीं,
हर कोई नहीं होता है यहाँ।
अपनी राह खुद बनानी है,
यही असली पहचान है जहाँ।

इस यात्रा में हो सकती हैं,
कई मुश्किलें और बाधाएँ।
पर आत्मा की आवाज सुनो,
यही असली है राह सही।

असामान्यता को अपनाओ,
यही है असली ताकत।
साधारण से हटकर जीना,
जीवन का असली मकसद।

तुम्हारी यह अनूठी पहचान,
तुम्हें सबसे अलग बनाएगी।
अपना उद्देश्य पूरा कर,
नई दिशा की ओर ले जाएगी।


इस असामान्यता को गले लगाओ,
यह जीवन का सच्चा रंग है।
अपनी राह खुद चुनो,
यही जीवन का असली संग है।