प्रेम तंत्र २



प्रेम ही सच्चाई है, प्रेम ही है दीप,
जहां कामुकता छूटे, वहां तन-मन का सुकून मिलीप।

तंत्र की यह राह, शुद्धता का आह्वान,
जहां देह मात्र माध्यम हो, और आत्मा बने प्रधान।

न स्पर्श में वासना, न दृष्टि में लालसा,
यह वह दिव्यता है, जहां तृप्ति बने परिभाषा।

प्रेम की गहराई में, आत्माओं का मिलन,
शुद्ध, पवित्र, अनछुआ, यह है तंत्र का दर्शन।

जैसे पुष्प की गंध, वायु में घुल जाए,
वैसे ही प्रेम का सार, तंत्र में लहराए।

तोड़ दे हर बंधन, देह का मोह,
तब ही होगा संभव, तंत्र का सच्चा बोध।


प्रेम - तंत्र



प्रेम ही असली सार है,
जीवन का यह उपहार है।
जब स्पर्श बिना वासना के हो,
आत्मा का मिलन, यह आधार है।

तन से परे, मन के पास,
जहाँ न हो कोई आस।
सिर्फ शुद्ध भाव का संगम,
यही तो तंत्र का विलास।

वासना से परे जो जाए,
उससे दिव्यता झलक जाए।
जहाँ प्रेम ही पूजा बन जाए,
तंत्र वहीं जीवन महकाए।

सांसों में बहती मधुर धारा,
दिल को छू जाए हर किनारा।
प्रेम जब हो शुद्ध और गहरा,
यही तंत्र का सच्चा सहारा।


जब मैं फिर से उठूंगा


मैं टूटा हूँ तो क्या हुआ, मैं बिखरा हूँ तो क्या,
ज़िन्दगी ने सीखा दिया—कौन अपना, कौन पराया।
पर एक बात मैं दिल में जलते दीये-सी रखता हूँ,
जब मेरा आत्मविश्वास लौटेगा… फिर कोई मुझे रोक न पाएगा।

आज हालात भारी हैं, पर दिल में अब भी शेर बसा है,
मेरे भीतर का योद्धा बस थोड़ी देर को सोया-सा है।
मैं गिरा ज़रूर हूँ, पर हार मानना मुझे आता नहीं,
मैं लौटकर आता हूँ तूफ़ानों-सा, खून में मेरे पीछे हटना लिखा नहीं।

जिन्होंने समझ लिया था कि मैं खत्म हो चुका हूँ,
जिन्होंने हँसकर कहा था—“अब ये उठ नहीं सकता है,”
उन के चेहरे की हँसी मैं याद रखे बैठा हूँ,
एक दिन लौटकर उन्हें वही जवाब देना बाकी है।

मैं ज़िन्दगी से भागूँगा नहीं, मैं डरकर छिपूँगा नहीं,
जो भी दर्द मिला, उसे अपना कवच बनाऊँगा।
आज मैं कमज़ोर दिखता हूँ, पर ये बस एक मौसम है,
मैं एक-एक चोट से अपना भविष्य चमकाऊँगा।

मेरा आत्मविश्वास मेरा हथियार है—
और वो किसी दिन फिर से चमकेगा।
और जिस दिन मैं मुस्कुराकर सीना तानकर खड़ा हो जाऊँगा—
उस दिन मेरे दुश्मनों का खेल ख़त्म हो जाएगा।

मैं शांत हूँ पर कमज़ोर नहीं,
मैं चुप हूँ पर टूटा नहीं,
मैं रुक गया हूँ पर खत्म नहीं—
मेरा इरादा अभी भी चट्टान जैसा है।

जिस दिन मैं फिर उठूँगा,
दुनिया देखेगी—
एक आदमी क्या कर सकता है
जब वो खुद पर फिर से यक़ीन कर लेता है।

मैं अपने ज़ख्मों से रोना नहीं चाहता,
मैं उन्हें ही अपनी धार बनाऊँगा।
और फिर वही लोग दंग रह जाएंगे—
जिन्होंने सोचा था कि मैं कभी न लौट पाऊँगा।

हाँ, एक दिन मेरा आत्मविश्वास लौटेगा,
और उस दिन…
मेरे दुश्मनों के लिए—खेल खत्म हो जाएगा।


बounce back का खेल



गिरा था जोर से, धूल में समा गया,
फेल का तमाचा था, पूरा लहराया।
पर मन में आया, एक बात बड़ी खास,
"अबकी बार, भाई, नहीं करनी कोई बकवास!"

रुथलेस होकर चल, न आधा-अधूरा काम,
जो भी करना है, करना होगा पूरे दाम।
चाहे सामने हो पहाड़, या हो समंदर,
इस बार तोड़ देंगे हर पुराना पिंजर।

कहानी का हीरो हूं, कोई बैकग्राउंड नहीं,
खुद का विलेन भी हूं, पर स्क्रिप्ट है मेरी सही।
गोल्स हैं बड़े, पर हौसला उससे बड़ा,
इस बार न रुकूंगा, चाहे कितनी हो सजा।

प्लानिंग हो पक्की, और फोकस हो तीखा,
कहीं दिखे आलस, तो मारूं उसे चीखा।
न खैर मांगू, न राहत का सहारा,
खुद का द्रोणाचार्य हूं, खुद से ही सारा।

गिरा था तो क्या, अब खड़ा हो रहा हूं,
हवा के खिलाफ, एक तूफान बन रहा हूं।
रुथलेस होना, यही मंत्र है मेरा,
आधा-अधूरा काम अब लगेगा फेरा।

तो दोस्तों, सीख लो इस कविता से बात,
फेल से डरो मत, ये है जीत का प्रजात।
गिरो, उठो, और फिर बनो शानदार,
इस बार बनो वो जो कहे, "वेल डन, सरदार!"


समय का पहिया चलता रहे,

समय का पहिया चलता रहे,
डेडलाइन्स की जंजीर में बंधा रहे।
काम का बोझ बढ़ता जाता,
हौंसला मगर कम न हो पाता।

समय की सुई आगे बढ़े,
मन की उम्मीदें हर रोज चढ़े।
दिन-रात की मेहनत रंग लाए,
डेडलाइन्स की राह में न थक जाए।

अवसर के दीप जलाते रहो,
सपनों की उड़ान भरते रहो।
मुश्किलें आएं, हौंसले बढ़ाएं,
डेडलाइन्स की जंग हम जीत जाएं।

हर पल का मोल समझो,
हर क्षण को सहेजते रहो।
समय की कद्र करना सीखो,
डेडलाइन्स को पूरा करना मानो।

फिर से उठ, बन शिकारी!


गिरा था, तो क्या हुआ?
आसमान भी कभी झुका?
ये जो जिद है, तेरी पहचान,
हिम्मत के संग बढ़ा तू इंसान।

पिछली बार जो हुआ अधूरा,
इस बार हो मुकाम पूरा।
आधे मन से काम नहीं,
अब दांव पे सबकुछ सही।

सोच, जो तू छोड़ेगा,
दुनिया कैसे तोड़ेगा?
हंसी में तेरा नाम हो,
मंज़िल तेरा गुलाम हो।

"रूठा है समय तो क्या,
फिर से बुलाएगा ये, बना सवेरा नया।"
कदम बढ़ा, बन तू निडर,
राह रोक सके न कोई पत्थर।

जोश ऐसा, जैसे तूफान,
बचने का दे न किसी को सामान।
मस्त चाल, आंखों में शेर,
अबकी बार खुदा भी तेरा फेर।

तो चल, मत देख पीछे,
आसमान को बना अपना नीचे।
इस बार जो ताने सुने,
उनको बना जीत के गहने।

रुकना नहीं, झुकना नहीं,
तूफानों से अब चूकना नहीं।
फिर से उठ, बन शिकारी,
तेरा नाम हो कहानी सारी।


डेडलाइन की रेस

डेडलाइन की रेस

डेडलाइन की रेस में हम सब भाग रहे हैं,
समय की हर इक बूंद को हम निचोड़ रहे हैं।

कागजों पर चल रही कलम की रफ्तार,
जैसे कोई धावक हो, दौड़ता बेजार।

सपनों के सागर में हम तैरते हैं,
लेकिन डेडलाइन के खंजर से घबराते हैं।

हर पल की गिनती में धड़कनें तेज होती हैं,
काम की चिंताओं में रातें भी खोती हैं।

दिमाग की गलियों में विचारों का शोर,
डेडलाइन के आगे सब कुछ लगता है कठोर।

लेकिन जब मंज़िल का होता है दीदार,
मेहनत का हर लम्हा लगता है बेकार।

क्योंकि डेडलाइन की रेस में जीत वही पाता है,
जो धैर्य और हिम्मत से, हर बाधा को मात दे जाता है।

समय की रफ्तार में बंधे,

समय की रफ्तार में बंधे,  
हम हर पल की दौड़ में,  
मिलते हैं मंजिल के करीब,  
जब सीमाएं बुनते हैं।

कागज़ पर लकीरें खींची,  
सपनों को सच करना है,  
डेडलाइन का पहरा सख्त,  
काम को पूरा करना है।

रातों की नींदें छीन लेती,  
जिंदगी की चाल को,  
पर मेहनत का फल मीठा,  
सजाता है जीवन के हाल को।

संग्राम में जुटे हम,  
लक्ष्य के संग्राम में,  
हर पल की क़ीमत समझते,  
समय के इस आयाम में।

डेडलाइन की डोर थामे,  
हम बढ़ते निरंतर हैं,  
हार न माने कभी,  
जीत की रचना करते हैं।

समय को साधना सीखते,  
जीवन को सफल बनाते,  
डेडलाइन की कसौटी पर,  
अपने सपनों को सजाते।

माया

ज्ञान का पराकाष्ट अंधकार को भगाता है, और सूर्य की किरणें हमें माया की असलीता को समझने की दिशा में अग्रसर करती हैं। सूरज की उजियार ने हमें दिखाया कि वास्तविक सुख और संतोष केवल बाहरी विश्व में नहीं मिलते, बल्कि वे हमारे अंतर के आत्मा के आध्यात्मिक आगे हैं। जैसे कि सूर्य की प्रकाश अंधकार को दूर करता है, वैसे ही स्वयं के अंधकार को दूर करके हम असली खुशियों का अनुभव कर सकते हैं। इस प्रकार, पारकाष्ट ज्ञान हमें माया की वास्तविकता के प्रति जागरूक करता है, हमें अंतर्निहित सत्य की ओर ले जाता है, और हमें आत्मा के अद्वितीय आनंद की खोज में अग्रसर करता है।

Where we are today

The past teaches us valuable lessons that we can learn from and use to grow and improve. It helps us understand who we are, where we come from, and how we got to where we are today.

The present is a gift because it is the only moment that is truly ours. We have the power to shape our present by making conscious choices and taking action. It's a chance to enjoy life, appreciate the beauty around us, and connect with others.

The future is our motivation because it gives us something to strive for. It's a chance to pursue our dreams, set goals, and work towards a better tomorrow. It's a reminder that our actions today can have a significant impact on our future, and that we have the power to shape our own destiny.
 The past is our teacher, the present is our gift, and the future is our motivation. By learning from the past, enjoying the present, and working towards a better future, we can lead fulfilling and purposeful lives.

Additionally, the past can also serve as a source of inspiration and guidance. We can learn from the mistakes and successes of those who came before us, and use that knowledge to make better decisions in the present.

The present is also a time for reflection and introspection. By being mindful and present in the moment, we can gain a deeper understanding of ourselves and our place in the world.

The future is not just a destination, but a journey that we create through our actions and choices. By setting goals and working towards them, we can shape our own futures and create a better tomorrow for ourselves and others.

In short, the past, present, and future are all interconnected and play important roles in shaping our lives. By embracing all three, we can lead fulfilling and purposeful lives that are rich in meaning and impact.


लेखन से दूरी का जादू



मैंने जाना,
कभी-कभी खुद को लेखन से अलग करना,
लेखन को और बेहतर बनाता है।
शब्दों के शोर से दूर जाकर,
खामोशी में नया अर्थ मिल जाता है।

पहले मैं हर बात को एक ही तरह से लिखता था,
हर नोट, हर विचार जैसे बंधा हुआ था।
अब मैंने तरीका बदला है,
और लगता है, ये बदलाव मेरे हक में है।

स्क्रिप्ट पढ़ता हूं,
हर शब्द के साथ बहता हूं।
विशिष्ट नोट्स लिखता हूं पहले,
सामान्य विचारों को छोड़ देता हूं पीछे।

जब सब कुछ लिख चुका होता हूं,
एक लंबी सैर पर निकल पड़ता हूं।
उस चलने की लय में,
वो स्पष्टता आती है, जिसकी तलाश थी।

हर कदम जैसे नया रास्ता दिखाता है,
हर सांस में सोच साफ़ हो जाती है।
फिर लौटकर,
मैं अपने विचारों को सही स्वरूप देता हूं।

यह दूरी नहीं,
यह एक तैयारी है।
जो मेरे लेखन को
और अधिक गहराई देती है।


समय की सीमा पर खड़ा, एक कवि सोच रहा था

समय की सीमा पर खड़ा, एक कवि सोच रहा था,
काम की दुनिया में, कहाँ सपनों का ठिकाना था।

सपनों की स्याही से लिखना चाहता था कुछ खास,
पर समय की सुइयों ने बाँध दिया उसे, जैसे कोई प्यास।

डेडलाइन की आवाज़ें कानों में गूंज रही थीं,
मन की गहराइयों में इच्छाएँ टूट रही थीं।

वक़्त का पहिया घूमता रहा, दिन और रात,
कवि की लेखनी में बंधी रही, काम की बात।

पर दिल के कोने में एक आस जगी,
कि कभी समय मिलेगा, बिना किसी घड़ी की बंदिशों के।

तब वो लिखेगा, अपनी रूह की स्याही से,
खुलकर, बिना किसी हड़बड़ी के।

समय की सीमाएँ तोड़, वो पाएगा खुद को,
एक नए सवेरे में, जहाँ कोई डेडलाइन ना हो।

समय की दौड़

समय की दौड़ में, हम सब भागते,
मुकाम पाने को, मंजिल को ताकते।
हर पल एक चुनौती, हर क्षण एक मीत,
समय सीमा की चिंता, न हार मानते हम जीत।

घड़ी की सुइयां कहती, तेजी से बढ़ो,
मंजिल दूर नहीं, मेहनत से चढ़ो।
चुनौतियों का सामना, आत्मविश्वास के संग,
समय की सीमा में, कार्य पूरे हर रंग।

जब समय की रेखा पास आए, मन में हो अटल विश्वास,
न डर, न घबराहट, बस हो मेहनत का आस।
समय की सजीवता में, हम खुद को ढालें,
हर समय सीमा को, हँसते-हँसते टालें।

काम का जुनून हो, दिल में उमंग,
समय की सीमा को, समझें हम संग।
हर दिन, हर रात, लगे रहें प्रयास,
समय सीमा की बाधा, हो जाए हमारे पास।

तो आओ, मिलकर संकल्प लें,
समय की सीमा में, कार्य पूरे करें।
हर लक्ष्य को पाए, हर मंजिल को जीते,
समय सीमा का पालन, हमारा मीत बने।

खुद से खेलना



गह! चमड़ी उतारता हूँ
अब तो ये हद हो गई, बस—
क्या कभी मैंने सोचा था ऐसा,
कि खुद को फिर से नया बनाऊँगा?

है, ये जो मैं हूँ, ये क्या है?
अब तो थोड़ी और क्रिएटिविटी दिखाऊँ,
उतारूँ, फिर से पहन लूँ कुछ और,
कभी ग्रीन, कभी रेड, कभी ब्लू!

मुझे तो अब लगता है,
क्या फर्क पड़ता है इस सब से?
मेरा रूप बदलता रहे,
मेरा दिल वही, वही चमकते चेहरे!

कभी सोचता हूँ, और कभी हँसता हूँ,
खुद से ये मजाक करता हूँ!
न कोई गंभीरता, न कोई डर,
बस मस्ती में खो जाने का सफर।

तो अब चमड़ी उतार ली मैंने,
और मन में फुर्र से उड़ा हूँ!
क्योंकि यही है मेरा तरीका,
हंसी में जीने का अपना तरीका!


Maya: Unraveling the Illusions of Human Consciousness- 2

In the labyrinth of human consciousness, Maya's psychology, as depicted in dreams, desires, love, and the quest for ultimate happiness, finds resonance in the ancient wisdom of Sanskrit shlokas:

ॐ असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मामृतं गमय॥
शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

Om Asato Ma Sadgamaya.
Tamaso Ma Jyotirgamaya.
Mrityorma Amritam Gamaya.
Om, lead us from falsehood to truth,
From darkness to light,
From death to immortality.
Peace, Peace, Peace.

This shloka from the Brihadaranyaka Upanishad encapsulates the essence of Maya's illusion, guiding us on a journey from ignorance to enlightenment. Maya, the veil of illusion, cloaks the truth of existence, leading us to chase after ephemeral desires and fleeting happiness. Yet, through the light of self-awareness and spiritual awakening, we can transcend the illusions of Maya and discover the eternal truth that resides within.

In dreams, Maya weaves intricate narratives of desire and fantasy, captivating the mind with its seductive illusions. Like a mirage in the desert, dreams tantalize us with promises of fulfillment, only to dissolve into the ether upon awakening. Yet, hidden within the realm of dreams lies the key to unlocking the mysteries of the subconscious, where our deepest desires and fears are laid bare.

Desires, fueled by Maya's allure, drive much of human behavior, leading us to pursue wealth, success, fame, and love in the quest for happiness. Yet, the objects of our desires are but fleeting illusions, transient shadows that vanish upon closer inspection. Maya convinces us that happiness lies in the external world, yet true fulfillment can only be found within the depths of our own being.

Love, the most potent illusion of all, holds the promise of ultimate happiness and fulfillment. Maya casts a spell of enchantment over our hearts, blinding us to the imperfections and complexities of human relationships. Yet, as the illusion of love fades and reality sets in, we are confronted with the inherent imperfections of ourselves and others, leading to disillusionment and heartache.

Ultimately, the pursuit of happiness, the Holy Grail of human existence, is shrouded in the illusion of Maya. Yet, through self-awareness, inner peace, and spiritual awakening, we can pierce through the veil of illusion and discover the eternal bliss that resides within. As the Sanskrit shloka implores, may we be led from falsehood to truth, from darkness to light, and from death to immortality, finding peace, peace, and peace eternal.

ध्यान का सागर

ध्यान जो करता है, वो 'मन' रहित हो जाता है,
जैसे हर नदी सागर की ओर बढ़ती है बिना नक्शे, बिना साथी के।
हर नदी, बिन किसी अपवाद के, अंततः सागर से मिलती है,
हर ध्यान, बिन किसी अपवाद के, अंततः 'मन' रहित स्थिति को पाता है।

ध्यान का मार्ग कठिन नहीं, सहज है,
जैसे नदी का बहाव स्वाभाविक, अनंत है।
बिना किसी मार्गदर्शक के, बिना किसी संकेत के,
हर नदी अपनी मंजिल पाती है, हर ध्यान 'मन' की सीमाएं मिटाता है।

ध्यान में डूबो, जैसे नदी सागर में मिलती है,
अपनी सीमाओं को छोड़, अंतहीन शांति को पाती है।
हर सोच, हर विचार, सब छूट जाते हैं,
ध्यान की गहराई में 'मन' से परे हो जाते हैं।

सागर की गहराई में, नदी खुद को खो देती है,
ध्यान की अवस्था में, 'मन' खुद को भुला देती है।
शून्य की अवस्था, शांति की पराकाष्ठा,
ध्यान के सागर में, 'मन' की अनंत यात्रा।

ध्यान की यात्रा


ध्यान हमें निश्चल मन की ओर ले जाता है,
जैसे हर नदी महासागर की ओर बहती है,
बिना किसी नक्शे, बिना किसी मार्गदर्शक के।
हर नदी, बिना अपवाद, अंततः महासागर तक पहुँचती है।

हर ध्यान, बिना अपवाद, अंततः निश्चल मन की स्थिति तक पहुँचता है।
ध्यान की यह यात्रा सहज है, 
बिना किसी बंधन, बिना किसी रोक-टोक के।
जैसे नदी अपनी राह खुद ब खुद चुन लेती है।

ध्यान की इस यात्रा में कोई दिशानिर्देश नहीं,
बस समर्पण की आवश्यकता है।
जैसे नदी अपने प्रवाह में आत्मसात हो जाती है,
वैसे ही ध्यान में मन की स्थिरता पाई जाती है।

महासागर की तरह, निश्चल मन की स्थिति भी विशाल और गहरी है,
जहां सभी चिंताएं, सभी विचार विलीन हो जाते हैं।
ध्यान की यात्रा हमें इस शांति की ओर ले जाती है,
जहां न कोई लक्ष्य है, न कोई मंज़िल, सिर्फ शुद्ध अस्तित्व है।

ध्यान का मार्ग


ध्यान अवश्य ही निर्विचार की ओर ले जाता है,
जैसे हर नदी बिना नक्शों के, बिना मार्गदर्शकों के
सागर की ओर बढ़ती है।
हर नदी, बिना किसी अपवाद के,
अंततः सागर तक पहुँचती है।
हर ध्यान, बिना किसी अपवाद के,
अंततः निर्विचार की अवस्था तक पहुँचता है।

समय की रेखा

समय की रेखा पर चलते हैं हम,
मंजिलें पास, पर लगती हैं कम।
दोपहर की धूप में तपते हैं पथ,
मिटेगी कब ये कड़ी मेहनत की थकन?

हर क्षण को गिनते हैं, बढ़ते हैं कदम,
उम्मीद की किरणों में बुनते हैं सपन।
समय की चाल से होड़ लगाते,
सपनों की ऊँचाईयों को छूने जाते।

डेडलाइन की सीमा में बंधे हैं हम,
पर सपनों की उड़ान से नहीं थमें।
कर्मवीर बन, संघर्ष की राह पर,
हर चुनौती को अपनाते हैं हम।

समय के साथ कदम से कदम मिलाकर,
जीतेंगे हर डेडलाइन, न रुकेंगे हारकर।
यह संग्राम अनंत, पर मन में है ठान,
हर मुश्किल पार कर, करेंगे नाम महान।

वासना की प्रकृति


वासना का अस्तित्व और उसकी समाप्ति हमारे मनोविज्ञान और आत्मविकास का महत्वपूर्ण विषय है। वासना की प्रकृति ऐसी है कि यह तात्कालिक होती है और जैसे ही किसी वस्तु या व्यक्ति को पाने की इच्छा पूर्ण होती है, उसका आकर्षण घटने लगता है। वासना को समझना और उसे नियंत्रित करना आत्मविकास का मार्ग खोलता है। संस्कृत शास्त्रों में इस विषय पर गहराई से चर्चा की गई है, जो हमें वासना को साधने के मार्ग में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।

वासना की प्रवृत्ति

वासना की विशेषता यह है कि यह एक ऐसी ऊर्जा है जो किसी लक्ष्य को पाने की ओर बढ़ती है। जैसे ही वह लक्ष्य प्राप्त होता है, ऊर्जा का उत्साह समाप्त हो जाता है। इस प्रवृत्ति को समझने के लिए भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:

> "ध्यानात् विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात् संजायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते।।"
(भगवद्गीता 2.62)



अर्थात, विषयों का ध्यान करते रहने से उनमें आसक्ति उत्पन्न होती है। आसक्ति से वासना उत्पन्न होती है, और वासना से क्रोध की उत्पत्ति होती है। यहाँ श्रीकृष्ण वासना को चेतना का एक ऐसा पहलू बताते हैं, जो अंततः नकारात्मक प्रभावों की ओर ले जाता है, यदि इसका सही रूप में प्रबंधन न किया जाए।

वासना का चरित्र बढ़ने और घटने वाला है। जब तक प्राप्ति नहीं होती, वासना का उबाल बढ़ता रहता है। जैसे ही वांछित वस्तु प्राप्त होती है, वासना शांत होती है, और कभी-कभी अगले आकर्षण की ओर बढ़ जाती है। इस प्रवृत्ति को समझते हुए ओशो ने कहा कि "वासना का असली स्वभाव अधूरापन है।"

वासना की उत्पत्ति का कारण

वासना का जन्म मनुष्य की अधूरी इच्छाओं से होता है। यह हमारे मन और विचारों की एक अवस्था है, जिसमें हमें लगता है कि किसी बाहरी वस्तु की प्राप्ति से ही हमारी पूर्णता होगी। यह एक भ्रम है, जिसे संतोष और आंतरिक सुख के माध्यम से समझा जा सकता है। वासना का स्वभाव केवल तब तक सक्रिय रहता है, जब तक हमें वह वस्तु प्राप्त नहीं होती।

> "असन्तोषो हि कामानां विकारः प्रथमः स्मृतः।"
(मनुस्मृति 7.45)



अर्थात, असंतोष ही कामनाओं का पहला विकार है। यह असंतोष ही मनुष्य को अधूरेपन का अहसास कराता है, जिससे उसकी वासना की उत्पत्ति होती है। यही असंतोष उसे बाहर की वस्तुओं और लोगों में खुशी खोजने के लिए प्रेरित करता है, परन्तु यह एक अंतहीन चक्र है।

वासना पर नियंत्रण कैसे करें

वासना पर विजय पाने के लिए आत्म-निरीक्षण और ध्यान को महत्वपूर्ण माना गया है। आत्म-निरीक्षण से मनुष्य अपने भीतर की अधूरी इच्छाओं और असंतोष के कारणों को समझ सकता है।

> "मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।"
(अष्टावक्र गीता 1.11)



अर्थात, मन ही बंधन और मुक्ति का कारण है। यदि मन शांत हो, तो वासना स्वतः ही समाप्त हो जाती है। वासना की वास्तविकता को जानकर मनुष्य धीरे-धीरे उसे अपने नियंत्रण में कर सकता है।

ध्यान और आत्म-निरीक्षण: ध्यान वासना को नियंत्रित करने का एक प्रभावी तरीका है। जब हम ध्यान करते हैं, तो हमारे मन में उत्पन्न होने वाली इच्छाएँ और वासनाएँ धीरे-धीरे शांत होने लगती हैं। ध्यान का उद्देश्य यह नहीं है कि हम अपनी वासनाओं को दबा दें, बल्कि उन्हें स्वाभाविक रूप से समाप्त कर दें। ध्यान के माध्यम से हम अपने मन को स्थिर कर सकते हैं और उन इच्छाओं से मुक्ति पा सकते हैं जो हमारे शांति और संतोष में बाधा डालती हैं।

> "योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।"
(योगसूत्र 1.2)



अर्थात, योग मन की वृत्तियों का निरोध है। जब मन शांत और स्थिर हो जाता है, तब इच्छाएँ, जो वासना का मूल कारण हैं, अपने आप समाप्त हो जाती हैं।

वासना और प्रेम का अंतर

वासना का सम्बन्ध केवल स्वार्थ से है, जबकि प्रेम नि:स्वार्थ होता है। वासना प्राप्ति और भोग पर केंद्रित होती है, जबकि प्रेम समर्पण और त्याग का प्रतीक है। प्रेम में व्यक्ति की संतुष्टि दूसरों के सुख में होती है, जबकि वासना में सुख की खोज केवल स्वयं के लिए होती है।

> "काम एव सदा कर्तुं रागं कुरुते जन्तुषु।"



वासना केवल स्वार्थ में लिप्त रहती है, जबकि प्रेम त्याग और सेवा में संतोष पाता है। प्रेम में आनंद की अनुभूति होती है, जबकि वासना में प्यास और बेचैनी।



वासना को समझना और उस पर विजय पाना हर साधक के जीवन का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य होता है। वासना का समाधान केवल आत्म-निरीक्षण, ध्यान, और योग से संभव है। जब हम अपने भीतर संतोष और प्रेम की खोज करते हैं, तो बाहरी आकर्षण स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं, और हम आंतरिक शांति को प्राप्त करते हैं। वासना का अंत ही सच्चे आनंद और मुक्ति का मार्ग है।

अतः, वासना की अनन्त प्यास को शांत करने का एकमात्र उपाय है आत्म-निरीक्षण, क्योंकि उसी से सच्चे संतोष का अनुभव किया जा सकता है।


रिश्तों की जटिलता



मैं एक बार एक महिला से बात कर रहा था,
जब मैंने कहा, "ज़्यादातर महिलाएं रिश्तों में इस उम्मीद के साथ आती हैं,
कि वे अपने मुद्दों को शांति और प्यार से सुलझा लेंगी,
लेकिन ज़्यादातर पुरुषों का मानना होता है
कि उन्हें वैसा ही स्वीकार किया जाएगा जैसे वे हैं,
और वे बदलाव की कोई इच्छा नहीं रखते।"

वो महिला मेरी बात से सहमत थी ,
एक पल की खामोशी में उसकी आँखों में स्वीकृति थी।
शायद उसने भी अपनी राहें और रिश्तों की यह सच्चाई महसूस की थी।

कभी लगता है,
क्या यही असली फर्क है,
हमारे दृष्टिकोणों में,
हमारे अपेक्षाओं में,
और हमारी प्यार करने की क्षमता में?

क्या यह स्वीकार्यता है,
जो हमें एक-दूसरे से दूर कर देती है?
या फिर यह समझ है,
कि हर किसी को बदलने का अधिकार नहीं है,
बल्कि हर किसी को उसकी असलियत में अपनाना ही सच्चा प्यार है।

रिश्ते में बदलाव की चाहत
कभी मिलकर बढ़ती है,
कभी दो अलग-अलग दिशा में जाती है।
लेकिन जब दोनों एक-दूसरे को जैसा वह है वैसा स्वीकार कर लेते हैं,
तब शायद यही सच्चा समर्पण है।


*धयान का सफर


ध्यान यकीनन ले जाता है मन से परे,
जैसे हर नदी पहुँचती है सागर के द्वार।
न कोई नक्शा, न कोई मार्गदर्शक,
हर नदी, बिना अपवाद, अंततः पहुँचती है सागर तक।

हर ध्यान, बिना किसी अपवाद के,
अंततः पहुँचता है शून्य मन की स्थिति तक।
ध्यान का यह सफर, निरंतर बहता,
हर मन में, शांति का सागर समेटता।

जैसे नदी की धारा, निरंतर बहती,
हर मोड़ पर, हर पत्थर से कहती।
मन भी ध्यान में, निरंतर बहता,
हर सोच से मुक्त, शून्य में डूबता।

ध्यान का मार्ग, सागर की ओर ले जाता,
हर नदी की तरह, अंततः शांति पाता।
मन का यह सफर, ध्यान में सिमटता,
हर ध्यान का लक्ष्य, शून्यता में मिलता।

Tyaag and Moksha: The Path to Oneness


In the vast tapestry of spiritual wisdom, the pursuit of Moksha, or liberation, stands as the pinnacle of human aspiration. Moksha is not merely a release from the cycle of birth and death; it is the ultimate union with the Divine, the realization of our true nature. The concept of Tyaag, or renunciation, is central to this pursuit, and its profound implications are beautifully illustrated in the teachings of Bhagavan Ramana Maharshi and sacred texts like the Srimad Bhagavad Gita and the Mahanarayan Upanishad.

#### The Essence of Tyaag

A striking anecdote involving Bhagavan Ramana Maharshi captures the essence of Tyaag. A philanthropist, having dedicated his life to building temples, schools, and engaging in various social services, sought guidance from Ramana on achieving Moksha. Ramana's reply was simple yet profound: “Do not do anything. Stop all activities and remain still, as you are.”

This response underscores the essence of Tyaag, which is not about the renunciation of material possessions or external duties but about the cessation of internal activities—thoughts, desires, and ego-driven actions. It is the relinquishment of the very impulse to act from a sense of personal doership.

#### Scriptural Insights

The Srimad Bhagavad Gita encapsulates this idea in the term "Sarvarambha Parityagi" (सर्वारम्भपरित्यागी), which Shankaracharya interprets as the renunciation of all activities, not merely their commencement. This suggests a state of being where one is not driven by the compulsion to initiate actions but remains a passive observer, responding naturally to the flow of life without personal attachment or egoistic involvement.

Similarly, the Mahanarayan Upanishad declares, “Na karmana na prajaya dhanena tyagenaike amritatvamanashuh” (न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः), affirming that immortality is not attained through actions, progeny, or wealth, but through renunciation. This renunciation is not of the external world but of the internal impulses that bind us to the cycle of karma.

#### The Path to Oneness

True renunciation, or Tyaag, leads to a state of Oneness. This is a state where the observer and the observed merge, where the creator and the created become indistinguishable. In this state, the ego dissolves, leaving no room for the sense of individual self. There is only pure being, a seamless integration with the Divine.

This state of Oneness is the ultimate stage of creativity. It is a state where one does not initiate actions but allows actions to flow through them, guided by the cosmic intelligence. It is the pinnacle of spiritual evolution, where the individual self is absorbed into the universal self.

#### Practical Implications

In practical terms, achieving Tyaag requires a disciplined mind and a heart open to the Divine. It involves regular meditation, self-inquiry, and a deep commitment to living in the present moment. By cultivating a state of inner stillness and detachment, one can gradually transcend the ego and experience the true nature of the self.

In conclusion, Tyaag and Moksha are intertwined in the journey towards spiritual liberation. By embracing renunciation—not of the world, but of the ego and its incessant demands—we can attain a state of Oneness, the ultimate realization of our divine essence. This path, as emphasized by Bhagavan Ramana, the Bhagavad Gita, and the Upanishads, leads us to the profound truth that liberation lies in the stillness of being, where we become one with the infinite consciousness.

Maya: Unraveling the Illusions of Human Consciousness

In the intricate dance of Maya, our consciousness is ensnared,
Veiling truth with illusions, in dreams we are dared.
Desires, like flickering flames, Maya does ignite,
Leading us on a quest for elusive delight.

न मुहुर्तं चिरं चारुं न सुखं दुःखमेव वा।
जीवितं जीवितेनैव मृत्योः क्वचिदप्युत्तरम्॥

Not a moment passes, neither beautiful nor vile,
Life, in its fleeting moments, does beguile.
For in the transient dance of joy and sorrow,
We seek escape from the cycle we borrow.

Wants, like waves upon the shore, incessantly arise,
Driven by the illusion of scarcity, our longing magnifies.
Yet, the more we chase, the further we stray,
Lost in Maya's maze, where shadows play.

कामादीनां करोद्धूतं प्राप्य धनं प्रयाति च।
नैते सत्या विज्ञानं लभयन्ते कदाचन॥

Love, the grand illusion, casts its spell,
Promising happiness, in its enchanting swell.
Yet beneath the surface, truth does lie,
Love's ephemeral nature, we cannot deny.

सर्वं दुःखं विवेकेन नाम्नाऽविवेकेन सर्वम्।
अविवेकेन विवेको विवेकेन न दुःखम्॥

In the pursuit of happiness, Maya's sway we must transcend,
For true joy resides within, where illusions end.
Through discernment (viveka), we pierce Maya's veil,
And find liberation, where truth prevails.

तमसो मा ज्योतिर्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय॥

Lead us from darkness to light, O divine,
Guide us to truth's radiant shrine.
In the realm beyond Maya's sway,
Eternal bliss, may we find our way.

रिश्तों में बदलाव की धाराएं



कई महिलाएं रिश्तों में अपनी ओर से ढलने को तैयार होती हैं,
यदि आप उन्हें अपनी पसंद और नापसंद बताएं,
वो उसे अपनाने की कोशिश करती हैं,
चाहे वह पहले कभी नहीं किया हो।
उनकी चाहत होती है रिश्ते को बनाकर रखना,
उनकी समझ में होता है कि बदलाव,
रिश्ते को और मजबूत बना सकता है।

लेकिन ज़्यादातर पुरुष स्थिर रहते हैं,
वे खुद को उसी रूप में पसंद करते हैं,
और रिश्ते के लिए बदलाव लाने में हिचकिचाते हैं।
वे इसे किसी तरह की कमजोरी नहीं समझते,
बल्कि यह उनके स्वभाव का हिस्सा बन जाता है,
कि उन्हें जैसे हैं वैसे ही स्वीकार किया जाए।

क्या यह फर्क,
हमारे दृष्टिकोण में ही छिपा है?
क्या महिलाएं प्यार के नाम पर खुद को बदलने के लिए तैयार होती हैं,
जबकि पुरुष अपनी जगह पर स्थिर रहते हैं,
क्योंकि उन्हें अपनी पहचान में कोई बदलाव पसंद नहीं?

कभी लगता है,
क्या यह स्थिरता और लचीलापन
हमारे रिश्तों को सही दिशा में ले जाते हैं,
या फिर यह दोनों के बीच की दीवार बन जाती है?
क्या एक-दूसरे के बदलाव की चाहत
वास्तव में प्यार को और गहरा करती है?